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जागरण जंक्शन के मंच पर साहित्य को मरने मत दो -एक अनुरोध

Posted On: 16 Feb, 2011 Others में

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नमस्कार दोस्तों… जागरण जंक्शन के मंच पर वैलेंटाइन कांटेस्ट अब समाप्त हो चूका है… प्रेम विषय पर संपन्न हुए इस कांटेस्ट पर अनेक लेखकों द्वारा बहुत ही उम्दा रचनाएं पोस्ट की गयी… जिन्होंने… प्रेम के अनेक पहलुओं को उजागर किया… इस कांटेस्ट ने प्रेम को गहनता से जानने का अवसर प्रदान किया… न केवल हमें अनेक प्रेरक पोस्ट पढने को मिले अपितु स्वयं भी प्रेम के इस महत्वपूर्ण विषय के बारे में गहनता से चिंतन मनन का अवसर भी जागरण जंक्शन द्वारा इस प्रतियोगिता को आयोजित करके उपलब्ध हुआ… इस हेतु जागरण जंक्शन का यह मंच साधुवाद का पात्र है… और इस हेतु मै एक बार फिर से जागरण जंक्शन को बधाई देता हूँ.

लेकिन दोस्तों इसी प्रतियोगिता के दौरान कुछ ऐसी रचनाएं भी देखने को मिली हैं जिस वजह से मुझे आज यह पोस्ट लिखने को मजबूर होना पड़ा है… मै उन रचनाओं का सार्वजानिक रूप से नाम तो नहीं लूँगा… लेकिन ये रचनाएं कुछ नवोदित तो कुछ इस मंच के प्रतिष्ठित लेखकों द्वारा पोस्ट की गयी हैं… यह मंच हम सबको अपने विचार सार्वजानिक रूप से सम्पूर्ण विश्व, सम्पूर्ण समाज के सामने व्यक्त करने हेतु सौभाग्य से प्राप्त हुआ है… और जब हम सार्वजानिक रूप से कोई बात कहते हैं… या अपना विचार समाज के मध्य प्रस्तुत करते हैं… तो एक लेखक के रूप में हमारे कुछ कर्तव्य और कुछ जिम्मेदारियां भी होनी चाहिए…

मात्र विचार व्यक्त कर देना ही ब्लॉग्गिंग या साहित्य लेखन नहीं है… आप क्या सन्देश दे रहे हैं यह महत्वपूर्ण है… कुछ पोस्ट पर जब मैंने यह प्रश्न उठाया तो उस पोस्ट के लेखक ने यह उत्तर दिया की यह मेरी राय है…और कई जगह कुतर्कों द्वारा स्वयं को सही ठहराने की कोशिश की गयी… लेकिन यह गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य है… और एक ब्लॉगर को यह उत्तर शोभा नहीं देता… अगर किसी की राय में ह्त्या उचित है तो क्या इस स्थिति में आप उसकी इस राय का समर्थन करेंगे? लेकिन इस मंच पर अनेक बार कुंठित विचारों से भरे पोस्ट लिखे गए … और मजे की बात तो यह है की इन पोस्ट पर अनेक ब्लागरों द्वारा (जिनमे प्रतिष्ठित ब्लॉगर शामिल हैं) सकारात्मक टिपण्णी दी गयी है… ये प्रतिक्रियाएं मात्र औपचारिकताएं हैं… और इस तरह गैरजिम्मेदाराना भी हैं. अगर आज इस बात पर हम विचार नहीं करेंगे … तो हम इसकी कीमत चुकाने की सामर्थ्य भी खो बैठेंगें.

एक विख्यात लेखक आल्विन कर्नान ने अपनी पुस्तक – द डैथ आफ लिटरेचर – में लिखा है – लोकप्रिय कल्चर और उपभोक्तावाद साहित्य को जकड रहा है. मॉस कल्चर ने एक विषम स्थिति पैदा कर दी है. कला ही नहीं, साहित्य की भी यही स्थिति है और उसकी मृत्यु की घोषणा की जा चुकी है. अब आप विचार करें की क्या सच में साहित्य की मृत्यु हो चुकी है?… क्या मानव जीवन को अर्थ देने वाले शब्दों के अर्थ समाप्त हो चुके हैं?..कहा गया है कि – तलवार से बड़ी ताक़त कलम में होती है – तो क्या आज वह कलम कमजोर पड़ गयी है?… जहाँ न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि… क्या यह पंक्ति निरर्थक हो गयी है?… क्या समाज को जगाने वाली शक्ति खुद मौत कि नींद सोने को आतुर है?… इस मंच के सभी पाठकों और लेखकों से इन प्रश्नों के उत्तर अपेक्षित हैं…. इन प्रश्नों को आप अनसुना नहीं कर सकते हैं…

आधुनिक तकनीक के चलते साहित्य का स्वरुप बदल रहा है… और प्रतिस्पर्धा हावी हो रही है… इस प्रतियोगिता के दौरान यही सब देखने को मिला… और तथाकथित प्रतिष्ठित ब्लोग्गेर्स कि कलई भी खुली क्यूंकि उनके लेखन का उद्देश्य हम सबके सामने जो आ गया. इस प्रतियोगिता में ऐसा मनोरंजन देखने को मिला जो मन रंजित नहीं.. विकृत ही कर डाले… सात्विक, सुरुचिपूर्ण न होकर अश्लील, कुत्सित और भौंडी प्रकृति का लेखन देखने को मिला… ऐसा लेखन देख कर अकबर इलाहाबादी का यह शेर याद आता है……

बेपर्दा देखीं आज मैंने चंद बीबीयाँ
अकबर ज़मीं में ग़ैरते कौमी से गड़ गया
पूछा मैंने उन्हीं से अरे वो पर्दा कहाँ गया
कहने लगी अक्ल पे लोगों के पड़ गया

आज के लेखक तथाकथित आधुनिकता का कवच ओढ़कर निम्न और वासनात्मक प्रवृत्तियों को बल दे रहे हैं… जो जितना विकृत है वह उतना ही आधुनिक है… इसके उलट सुसंस्कृत होना पिछड़ेपन की निशानी है… संस्कृति पोषक, मूल्य संवर्धक तथा समाज एवं राष्ट्र को दिशा देने वाला लेखन तो कहीं कहीं ही मिलता है… और जहाँ कहीं मिलता है… उसे किताबी बातें आदि उपमाओं से संबोधित कर ख़ारिज कर दिया जाता है… इस तरह का मत रखने वाले शायद मुंशी प्रेम चंद की इन पंक्तियों से वाकिफ नहीं हैं – यदि साहित्य का काम केवल मन बहलाव का सामान जुटाना, केवल लोरियां गा कर सुलाना या केवल आंसू बहा कर जी हल्का करना है, तो इसके लिए विद्वानों की आवश्यकता नहीं है….. हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते… हमारी कसौटी पर वाही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमे उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हम्मे गति और बैचेनी उत्पन्न करे… सुलाए नहीं, क्यूंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है. – ये कोरे शब्द नहीं है…की जिनको यथार्थ के धरातल पर ना उतारा जा सके… ये किताबी बाते नहीं हैं… अगर आपको ये किताबी लगती हों तो दोष आपका है… क्यूंकि किताब पर लिखी गयी ये इबारतें किसी की सोच और चिंतन का परिणाम ही हैं… ये किसी के जीवन के अनुभव का नतीजा हैं…. हाँ यह जरुर हो सकता है की हमने जीवन के इस पहलु को कभी अनुभव ही न किया हो… तो यह दोष तो हमारा ही है.

कहने वाला कह गया दो हिचकियों में राज ए दिल
लोग पीछे मुद्दतों तक गुफ्तगू करते रहे.

लेखन दलाली के गर्त में धंस रहा है… लेखन नाम और शोहरत के लिए हो रहा है… लेखन समाज के लिए नहीं अपितु टी. आर.पी. के लिए हो रहा है… यह जागरण जंक्शन के इस मंच पर साफ़ साफ़ दृष्टिगोचर हो रहा है… आप इसकी बानगी फीडबैक में और विभिन्न लेखों और उन पर दी जा रही प्रतिक्रियाओं को पढ़कर अनुभव कर सकते हैं…. सारी होड़ फीचर्ड, चर्चित, अधिमुल्यित और अधिपठित ब्लॉग को लेकर है… ठीक है यह भी लेखक की चाह हो सकती है और ऐसा होना बुरा नहीं है… लेकिन यह सब करने के लिए लेखन के साथ समझौता करना… गलत सन्देश देते लेखों से सहमति जताना… भौंडे शीर्षकों का प्रयोग करना और वैर की भावना रखना कहाँ तक उचित कहा जा सकता है…. इस विषय पर आप सभी गणमान्य लेखकों से सहयोग अपेक्षित है.

साहित्य का अर्थ है…. जो हित में हो… साहित्य को हितकारी कैसे बनाया जाये?…. महर्षि अरविन्द का एक कथन है – भारत की दुर्बलता का कारण चिंतन शक्ति का ह्रास है… ज्ञान की भूमि में अज्ञानता का विस्तार है. – इस अज्ञान के कारण ही साहित्यकार स्वार्थ .. लोभ और भय के अन्धकार में फंस जाता है… विवेक का आभाव उसे संकीर्णताओं में बांधता है… और आत्मा की सुषुप्ति ही साहित्य की मौत का कारण है… इसलिए साहित्य को यदि पुनः जाग्रत करना है तो साहित्यकार की आत्मा को जीवित करना होगा… लेखनी को रचनात्मक और सकारात्मक करना है तो लेखक को ज्ञानी होना होगा… साहित्यकारों को अपनी गलत महत्वाकांक्षाओं की बलि देनी होगी तभी वह शब्दों के प्रकाश से समाज के अंधकारों को दूर कर पाने में समर्थ हो पायेगा.

जागरण जंक्शन और इस मंच पर उपस्थित सभी ब्लोगरों से मेरा एक अनुरोध है की मृतप्राय हो रहे साहित्य को जीवित करने की एक मुहीम हम सब प्रारम्भ करें… और निस्स्वार्थ और उद्देश्यपूर्ण लेखन के द्वारा इस उद्देश्य की प्राप्ति संभव है… अंत में श्रेष्ठ साहित्यकारों के सम्मान में ये पंक्तियाँ….

मौत उनकी है जिनको करे ज़माना याद
यूँ तो आते हैं सब यहाँ मरने के लिए.

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90 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

omprakash pareek के द्वारा
February 26, 2011

हिमांशुजी, तारीफ की बात नहीं है बल्कि यकीं मानियेगा इतना विचारोत्तेजक लेख मैंने इस मंच पर पहली बार पढ़ा .मेरा मतलब ये नहीं कि ऐसे लेख और नहीं होंगें पर सब के सब तो नहीं पढ़ सकता. साहित्य के बारे में आपके विचारों से सहमत होते हुए भी एक बात कहना चाहूँगा कि साहित्य का काम समाज को जगाना या सुधारना आदि नहीं है .अधिकांस साहित्यकार लिखते समय इस उद्देश्य को ले कर नहीं चलते बल्कि उनकी रचनाधर्मिता स्वान्तः सुखाय होती है और इस प्रक्रिया में अक्सर समाज के लिए भी कुछ अच्छा हो जाता है पर उसे “बाई प्राडक्ट” मानिए. बहरहाल चिंतन और सर्जनात्मकता कि बात से मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ. आपने मुन्स्शी प्रेमचंद का जो उद्धरण कोट किया वो वास्तव में अद्वितीय है. चिंतन शक्ति के हराश कि बात बिलकुल सही है. यह बड़ा खतरा है. साहित्य कि बात छोडिये, यहाँ तक कि राजनीती में भी आयीडियोलोग नहीं रहे कोई सो चिंतन का सर्वथा आभाव है जिसका परिणाम निरंकुश, बेलगाम व सिद्धान्तहीन राजनीती में हुआ. ब्लागलेखन के बारे में आपके विचारों से मैं सहमत हूँ क्यों कि किसी के 33 ब्लॉग पर जब 1250 प्रतिक्रियाएं देखि तो ताज्जुब हुआ फिर ये सोच कर उन्हें पढने बैठा कि वाकई कुछ कमाल कि बात मिलेगी जो इतने लोगों ने कमेन्ट किया है परन्तु घोर निराशा हुई क्योंकि मेरी अपनी व्यक्तिगत राय में मसल बिलकुल मिडियोकर था. ब्लाग technology कि देन है और यह भासा को कुछ नए शब्द और ईडियम भी दे रहा है. इस से भासा समृद्ध होती है. जयपुर के विश्व साहित्य सम्मलेन में हुई एक परिचर्चा में हिंदी में ब्लॉगों द्वारा जो कुछ नए डेवलपमेंट हो रहें हैं उस पर काफी दिलचस्प वर्तालाप हुआ. इस में मैंने भी भाग लिया और विद्वज्जनों के विचारों से मुझे इस बारे में ज्ञान प्राप्त हुआ था. आपके विचार सुन्दर हैं परन्तु पाजिटिव नहीं ऐसा मुझे लगा क्योंकि मेरी अपनी राय में साहित्य और साहित्यकार अक्सर घोर निरस्य के अंधेरों को चीर कर सूरज कि तरह प्रकाशपुंज बन कर udit होते हैं

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 28, 2011

    आपने इतने सुंदर विचारों से अवगत कराया इस हेतु आपका धन्यवाद… आपका सहयोग सदैव अपेक्षित रहेगा.

Nikhil के द्वारा
February 24, 2011

प्रिय हिमांशु जी, आपके इस तार्किक लेख की जितनी प्रशंशा की जाए कम है. आपका ये मुद्दा सिर्फ जागरण के मंच तक ही सीमित नहीं है, आज हर तरह के साहित्य को इससे रूबरू होना पर रहा है. जहाँ देखो वहीँ भौंडापन है. लोग इसलिए लिखते हैं की विवादों को जनम दिया जा सके और उन्हें लोकप्रियता हासिल हो सके. समाज में व्याप्त व्याधियों पर समदृष्टि रख लिखने की बात अब पुराणी हो गयी है. सच्चाई की बयार तो अब शायद ही चलती है. लेकिन एक रिश्ता जुडा है इस लेख से आपके साथ. सह-योद्धा का. आपके इस युद्ध में मेरी तरकश के तीर भी इस्तेमाल होंगे. आभार, निखिल झा

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 26, 2011

    धन्यवाद निखिल जी…… आपके सहयोग के लिए….. आभार.

vinita shukla के द्वारा
February 21, 2011

बहुत ही शुभ आह्वान हिमांशु जी. सुन्दर पोस्ट वही है जो दिल से लिखी जाए, किसी स्वार्थपूर्ण उद्देश्य से प्रेरित होकर नहीं.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 26, 2011

    धन्यवाद विनीता जी……. आभार………..

Mala Srivastava के द्वारा
February 20, 2011

बहुत सी सार्थक बातो से भरा लेख है आपका .. !

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 20, 2011

    धन्यवाद………….. माला जी….. आभार………….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 20, 2011

    धन्यवाद………….. माला जी….. आपका बहुत आभार की आपने इस पोस्ट को सराहा…………..

dinesh arya के द्वारा
February 19, 2011

क्या खूब लिखा हैं सर मैं तो आपके लेखो का मुरीद हो गया हु ………मैं आप के लेखो के लिये क्या शब्द लिखू ऐसे लेखो के लिये तो में आपको बहुत -बहुत बधाई देता हु और आप इस तरह के लेख लिखते रहे जिससे की हम भी कुछ ज्ञान ले सके . एक बार फिर आप को बहुत -बहुत बधाई ………..

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 20, 2011

    दिनेश भाई…. आप मेरा लेख पढने इस मंच पर आये…. इस हेतु आपका धन्यवाद करना चाहूँगा….

akhilesh के द्वारा
February 18, 2011

छा गए गुरु :-) Keep up the gud work. Every thing u do… u do it with 100% dedication. This is the only thing that makes u different from other achievers. Hope to c u more in action

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 18, 2011

    dear akhilesh thanks for your valuable support…..

rita singh \\\'sarjana\\\' के द्वारा
February 17, 2011

हिमांशु जी , नमस्कार l बहुत सुन्दर भाव से विश्लेषित आपका लेख विलम्ब से सही आज पढ़कर अच्छा लगा l ऐसी अनेक बाते जो मुझे अच्छी नहीं लगती उसे आपने सहजता से व्यक्त किया आपने ,शुक्रिया l साहित्य के बारे में आपने बहुत अच्छी बाते कही हैं ,साहित्य समाज का दर्पण होता हैं और लेखको की जिम्मेदारी भी समाज के प्रति l जब मैंने jj मंच पर ब्लॉग लिखना शुरू किया तो सोचा भी न था यहाँ भी राजनीती या गुटबाजी होगी l मैं तो शांतिप्रिय हूँ ,खुश रहना तथा ख़ुशी देना मुझे अच्छा लगता हैं l मुझे लिखना अच्छा लगता हैं लिखती हूँ मगर मैं जानती हूँ मेरी भाषा पर उतनी जानकारी नहीं हैं जो कि एक लेखक या लेखिका के लिए जरुरी होता हैं l ऐसे में वरिष्टजनों के प्रतिक्रिया चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक दोनों ही क्षेत्र में मेरे लिए महत्वपूर्ण होता जिससे मुझे कुछ न कुछ सिखने को अवश्य ही मिलता हैं l बहरहाल ,एक अच्छे लेख प्रस्तुत करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार l

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    रीता जी…. नमस्कार आपने बहुत उत्तम बातें इस टिप्पणी में कहीं हैं…. इस हेतु मई आपका आभार व्यक्त करता हूँ…..

brajmohan sharad के द्वारा
February 17, 2011

आदरणीय हिमांशुजी नमस्कार .. आपने ब्लोगर्स की अभिव्यक्तियों ..रचनाओं का सम्यक विश्लेषण ..उचित-अनुचित मापदंडो की व्याख्या कर किया है ..इस पर निश्चित ही एक सार्थक बहस की शुरुआत होनी चाहिए …ऐसी उम्मीद हम करते है … जाग.जन. ने हिंदी साहित्य के सरंछान-संवर्धन का जो बीड़ा उठाया है उसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है ….यहाँ कहानी-कविताएं-लेख -निबंध पड़ने को मिल रहे हे …जिन्हें उत्क्रस्त ,उत्तम, अच्छा और निक्रस्त /आपत्तिजनक श्रेणियों में रखा जा सकता है … एक सुझाव है की निक्रस्त /आपत्तिजनक रचनाओं का जाग.जन. द्वारा बहिष्कार किया ही जाना चाहिए …[ उल्लेख सहित ]

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    ब्रजमोहन जी…. आपने इस पोस्ट पर समय निकाल कर अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी दी है इस हेतु आपका आभार व्यक्त करता हूँ… निश्चित ही सार्थक बहस की जरुरत है…. इस मुद्दे पर…. मुझे भी ऐसा ही लगा… इसीलिए यह पोस्ट लिखा… हो सकता है कई साथी इस पोस्ट से नाराज हों… लेकिन सबकी बेहतरी के लिए यह जोखिम तो लेना ही पडेगा… आप का समर्थन मिला है इस हेतु आपको धन्यवाद देना चाहूँगा…..

Dharmesh Tiwari के द्वारा
February 17, 2011

हिमांशु जी नमस्कार,बहुत ही गहराई से कुछ अहम् बिन्दुओं पर प्रकाश डाला है आपने इस लेख के जरिये,धन्यवाद!

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    धर्मेश जी … नमस्कार इस अपील पर आपका सकारात्मक अपेक्षित सहयोग मिलेगा ऐसी ही आशा है… यदि आप लेख के महत्वपूर्ण उठाये गए बिन्दुओं पर अपने विचारों से अवगत करा पाते तो ज्यादा ख़ुशी मिलती….. आपके स्नेह हेतु आभार….

R K KHURANA के द्वारा
February 16, 2011

प्रिय हिमांशु जी, आपका लेख पढ़ कर प्रसन्नता हुई की आपने एक सही बात को उठाया है ! परन्तु शायद आप इस मंच से नये जुड़े है आपने सभी ब्लागर्स को नहीं देखा ! जैसे की शाही जी ने कहा नवोदित लेखको ने इस मंच से बहुत कुछ पाया और सीखा है ! जहा तक प्रतिक्रीयायों का सवाल है तो मैं यह कहना चाहता हूँ की प्रतिक्रिया मिलने से जहां उत्साह मिलता है वही अपनी कमियों का भी पता चलता है ! राजकमल जी ने एक बार लिखा था की जब उनकी पोस्ट फीचर्ड होती थी तो ख़ुशी के मारे उनके आंसू निकल आते थे ! आप इस भावना को समझ सकते है ! हाँ यहाँ मैं शाही जी की इस बात से सहमत नहीं की जागरण टीम केवल प्रतिक्रिया की संख्या पर पुरस्कार देती है ! यह मेरा स्वंय का अनुभव है की जागरण टीम ने लेख को महत्त्व दिया है ! न की लेखो या प्रतिक्रिया की गिनती को ! इस मंच पर ऐसे ऐसे लेखक भी थे जिन्होंने बहुत लेख आदि लिखेऔर कुछ लेखको को 200 तक प्रतिक्रियाये मिली लेकिन उनका नाम टाप 20 में भी नहीं आया ! लेकिन जागरण ने अच्छे लेखो को अधिमान भी दिया और प्रुस्कृत भी किया ! मैं इस बात के लिए जागरण टीम का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ ! इधर कुछ लोग आपस में गाली गलौच तक करने लग गए है जो की बहुत ही शर्मनाक बात है ! लेखक तो समाज को शिक्षा देने वाला और समाज को आईना दिखाने वाला होता है ! यदि हम ही आपस में गलियां देने लग जायेंगे तो हम समाज को क्या सन्देश देंगे ! इस मंच पर लेखक और लेखिकाएं दोनों अपने विचार रखते है अगर हम मर्यादा का पालन नहीं करेंगे तो आपके बारे में लोग क्या सोचेंगे ! मुझे आशा है की मेरी बात के भाव को समझ कर मर्यादा का पालन करते हुए लेख लिखे जायेंगे ! धन्यवाद आर के खुराना

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    नमस्कार खुराना जी…. आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया प्राप्त हुई….. धन्यवाद…. आपका कथन उचित है…. और मै प्रतिक्रियाओं का विरोधी भी नहीं हूँ…. मै तो लेखन के नाम पर कुछ भी परोस देने के विरूद्ध हूँ… और प्रठिस्थित लेखकों द्वारा दी जा रही निरर्थक प्रतिक्रियाओं पर नाराज भी हूँ…. कम से कम प्रतिष्ठित लेखकों से सार्थक प्रतिक्रियाओं की उम्मीद करना बेमानी तो नहीं है… जहाँ विरोध जायज है… वहां आवाज़ तो उठानी ही पड़ेगी…. ऐसा मेरा मानना है… आप जैसे लेखकों से सदैव मार्ग दर्शन की उम्मीद मुझे रहेगी…. आपका आभार.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 17, 2011

    आदरणीय खुराना साहब, सादर प्रणाम! शायद संजीव जी की प्रतिक्रिया के नीचे मैं अपने अभिप्राय को स्पष्ट नहीं कर पाया था, जो यहां फ़िर से करना चाहूंगा । टिप्पणियों की संख्या को तरज़ीह प्राप्त होने से मेरा मतलब किसी प्रतियोगिता से नहीं, बल्कि ‘ज़्यादा चर्चित’ कालम में स्थान प्राप्त करने से है, और यह भी प्रकारांतर से एक सम्मान की श्रेणी में आता है जिसे रोज़ देखा ही नहीं जाता है, बल्कि उसपर क्लिक कर सीधे तौर पर अधिकाधिक संख्या में लेख पर पाठकों की पहुंच का मार्ग भी प्रशस्त होता है । ज़ाहिर है यह कालम हर लेखक के आकर्षण का केंद्रबिन्दु है, और हर किसी का इसमें स्थान प्राप्त करने के लिये प्रयत्नशील होना लाज़मी है । प्रतियोगिता में पुरस्कृत होने के लिये अर्हता मिले न मिले, परन्तु सप्ताह का ब्लागर बनवाने में तो ये कालम सीधे-सीधे योगदान करते ही हैं । इससे कौन इंकार करेगा ? टिपाणियों से जुड़े कदाचार की गंगा यहीं से निकलती है, जो आरम्भ में निर्मल और पावन होते हुए भी अंत में अपनी पहचान खोकर कचरे के नाले का स्वरूप ले लेती है । प्रत्यक्षं किं प्रमाणम ? आप अभी इसी वक़्त वहां पहुंचिये और ज़्यादा चर्चित में सबसे ऊपर से तीन चार रचनाओं को खोलकर उनकी सारी टिप्पणियां पढ़ जाइये, आपकी तवीयत हरी हो जाएगी । ऐसा पहली बार भी नहीं हो रहा, हममें से ढेर सारे इस खेल के रिटायर्ड लोग हैं । जहां तक प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत होने की बात है, यह जागरण जंक्शन प्रबंधन के विशेषाधिकार का मामला है कि वह किसको किस आधार पर चुनता है । इस पर कोई बहस की ही नहीं जा सकती । उन्होंने कुछ सीखने के लिये एक बड़ा प्लेटफ़ार्म मुहैया करा दिया है, यह भी कोई कम बड़ा पुरस्कार नहीं है । अब चूंकि मंच पर स्तरीय लेखकों की अच्छी संख्या हो चुकी है, लिहाज़ा प्रबंधन को चाहिये कि प्रोत्साहन की नीतियों में संशोधन और परिमार्जन करे, ताकि सभी लोग बच्चा क्लास वाली अपनी तंग पड़ती निकर से मुक्त होकर कुछ वयस्कपरक हाथ दिखा सकें । हिमांशु जी से अनुरोध है कि इस आलेख की सभी टिप्पणियों का जवाब लिखकर उनकी संख्या में यथाशीघ्र यथोचित वृद्धि करने का कष्ट करें, ताकि आलेख चर्चित कालम में शामिल होकर बहस को जारी रख पाए । अन्यथा उनके इस सद्प्रयास को भी गुमनामी के गर्त में समाते देर नहीं लगेगी । साधुवाद ।

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    शाही जी…. प्रणाम…. मै भी यहाँ पर स्पष्ट करना चाहूँगा की मै प्रतिक्रियाओं की संख्या… या देने के विरोध में नहीं हूँ… और इस पोस्ट में मैंने ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है… मै तो एक अपील कर रहा हूँ… प्रतिक्रिया देने वालों से की अगर उनका ज़मीर किसी बात से इत्तेफाक नहीं रखता है तो उस पर अपनी आपति अवश्य दर्ज कराएँ… प्रतिक्रियाएं जागरण जंक्शन द्वारा दिया गया एक अमूल्य हथियार हैं … उसका सही प्रयोग करना सीखें… न की उसका प्रयोग तुष्टिकरण के लिए करें…. जैसा की देखने में आ रहा है….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    एक बात मै और यहाँ पर कहना चाहूँगा की मैंने जागरण जंक्शन के लिए इस लेख में कुछ भी ऐसा नहीं लिखा है…. लेकिन ज्यादातर ब्लॉगर प्रतिक्रिया देते हुए यह कह रहे हैं की जागरण जंक्शन प्रबुद्ध है… वह सही निर्णय लेगा… आदि आदि.. यह लेख पूरी तरह से ब्लॉग लेखन और उससे जुडी जिम्मेदारियों को लेकर है ना की जागरण मंच की खामियों को लेकर और ना ही इस वैलेंटाइन प्रतियोगिता और उसके विजेता के चयन को लेकर….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 17, 2011

    हिमांशु जी मैं भी शाही जी की इस अनुरोध से सहमत हूँ की इस आलेख की सभी टिप्पणियों का जवाब लिखकर उनकी संख्या में यथाशीघ्र यथोचित वृद्धि करने का कष्ट करें, ताकि आलेख चर्चित कालम में शामिल होकर बहस को जारी रख पाए । अन्यथा उनके इस सद्प्रयास को भी गुमनामी के गर्त में समाते देर नहीं लगेगी । इसी के साथ मैं JJ से भी इस संबंध मे अनुरोध करना चाहता हूँ की आपके इस लेख को टॉप ब्लॉग मे शामिल करें………… ताकि ये सार्थक लेख अधिक से अधिक लोगों के विचारों को सामने लाये……. ओर कोई सार्थक हल निकले…………..

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    शाही जी और पियूष भाई…. आपका बहुत बहुत धन्यवाद….

    R K KHURANA के द्वारा
    February 18, 2011

    प्रिय शाही जी, मैं आपकी बात से बिलकुल सहमत हूँ ! और बात को स्पष्ट करने के लिए आपका आभारी हूँ ! धन्यवाद ! हाँ एक निवेदन आपसे करना चाहूँगा की आप मुझे :”प्रणाम” मत किया करे ! आपकी और मेरी आयु में कुछ ज्यादा अंतर नहीं होगा ! आप अनुज हो सकते है परन्तु मैं आपसे इतना बड़ा भी नहीं हूँ की मैं आपकी तरफ से “प्रणाम” की अपेक्षा करूँ १ मैं आपकी भावनायों की कद्र करता हूँ और आपके इस अभिवादन को दिल से स्वीकार करता हूँ ! परन्तु मैं तो एक अदना सा “कलम घसीटू” हूँ ! आपका नमस्कार करना ही मेरी लिए बहुत सम्मान की बात है ! आशा है अन्यथा न लेंगे ! आर के खुराना

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 18, 2011

    आदरणीय खुराना साहब, प्रणाम! आपका स्नेह भरा यह निर्देश मुझे मेल पर भी प्राप्त हुआ था, जिसका उत्तर आप पढ़ चुके होंगे । लिहाज़ा आपके मना करने के बावज़ूद मैं उसी अभिवादन से यहां फ़िर आपको सम्बोधित करने की धृष्टता कर रहा हूं । धन्यवाद ।

chaatak के द्वारा
February 16, 2011

स्नेही हिमांशु जी, आपकी बात बिलकुल सही और विचारणीय है| विचार प्रकट करने का अधिकार सभी को है और ब्लागिंग एक ऐसा तरीका है जिसमे हर तरह के लोग अपने अपने ढंग से लिखते और टिप्पड़ी करते हैं | साहित्य की समझ रखने वालों की संख्या तो शायद बहुत ही कम होगी इसलिए साहित्य को सही दिशा में ले जाने की जिम्मेदारी सिर्फ उनकी है जो साहित्यकार हैं या फिर जिन्हें साहित्य की समझ है और इन्हें जगाने के लिए आपकी लिखी इस पोस्ट से जरूर सन्देश मिलेगा| आशा है कि यह वर्ग सकारात्मक पहल भी करने को तत्पर होगा| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    चातक जी….पोस्ट की सराहना करने के लिए आपका आभार… यह बात सही है की विचार प्रकट करने का अधिकार सभी को है…. लेकिन अधिकार के साथ कुछ कर्तव्य और जिम्मेदारियां भी जुड़ जाती हैं… कुछ भी सार्वजानिक रूप से कह देना उचित नहीं होता… हमारी कुछ मर्यादाएं और सीमाएं हैं… जिनके दायरे में रह कर हमें लेखन करना है… मै आपकी इस बात से थोडा असहमत हूँ की सब जिम्मेदारियां साहित्यकारों की हैं… अगर ऐसा है तो इस जिम्मेदारी की अवहेलना करने वालों को लेखन से दूर रहना चाहिए… क्योंकि मेरा मानना है की किसी भी प्रकार का लेखन साहित्य की श्रेणी में ही आता है… चाहे उसकी कोटि अलग अलग हो… आप ब्लॉग लिख रहे हैं… यह भी साहित्य की एक नयी विधा है… ब्लॉग लेखन में भी आप साहित्य के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते…. आप जैसे मंच के प्रथिष्ठित लेखकों से सैदेव मार्ग दर्शन का आकांक्षी रहूँगा… धन्यवाद.

Amit Dehati के द्वारा
February 16, 2011

आदरणीय हिमांशु जी प्रणाम ! बहुत ही ज्ञानवर्धक सन्देश दिया आपने ……अमल करने योग्य ……. मैं पूर्ण रूप से सहमत हूँ आपके इन विचारों से ……..आपने मेरे मन की बात कह दी इसके लिए आभार !!!!! गुस्ताखी कर रहां हूँ …..लेकिन …..यहाँ साहित्य के साथ मजाक किया जा रहा है और इस कुकृत्य में मैं भी शामिल हूँ …… मुझे लग रहां है की अब हम JJ के माध्यम से एक जिम्मेदार लेखक हो गए है जिसका समाज पर सीधा प्रभाव पड़ेगा ….बेशक हम अपने विचारों को लिखते हैं | लेकिन हमें समीक्षा करने चाहिए की इन विचारों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा | क्या ये जन हित में है , क्या लोग इससे लाभान्वित होंगे और होंगे तो उनका लाभ नैतिक होगा ? हमारे द्वारा लिखे हुए लेख को हजारों लाखो लोग पढ़ते होंगे | लेकिन हमें इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए की हमारे द्वारा लिखा हुआ महत्वपूर्ण लेख क्या सन्देश दे रहा है | JJ के कार्यकर्त्ता गण को इस मामले में दखल जरुर देना चाहिए !!!!! और शायद कुछ लोगों को फीचर्ड होने की ज्यादा ललक है इस लिए आपके द्वारा कही हुई बातें उन्हें राश नहीं आएँगी | मैं आपका आभारी हूँ …..बहुत सुन्दर विचार आपने व्यक्त किया …….. मैं आपका पूर्ण रूप से समर्थन करता हूँ ….. अमित देहाती

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    अमित जी…. आपने बेहद रोचक टिप्पणी दी है… आप कहते हैं की आप भी इस कुकृत्य में शामिल हैं… और ऐसी प्रतिक्रिया देने वाले आप एकमात्र पहले ब्लॉगर हैं… मै यह तो नहीं जानता की आप ऐसा क्यों कह रहे हैं लेकिन जो भी कारण हो आपने इमानदारी तो दिखाई है… इस हेतु आप सम्मान के पात्र हैं… आपने इस मुद्दे पर मेरा समर्थन किया इस हेतु मै आपका आभारी हूँ… और आगे भी आपसे सहयोग की आकांक्षा रखूँगा….

    Amit Dehati के द्वारा
    February 20, 2011

    आदरणीय हम किसी को प्रोत्साहन में उसके गलत भी बातों का समर्थन कर देतें हैं बिना कुछ सुझाव दिए …क्या ये किसी कुकृत्य से कम हैं ? एक बार फिर से आपको धन्यवाद देना चाहूँगा …..मेरे बातों से आपको स्पष्टवादिता दिखी इसके लिए आभार …….आदरणीय मैं सच्चाई से मुह नहीं मोड़ सकता | बधाई

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 20, 2011

    अमित जी यह बहुत अच्छी बात है…. आपका सहयोग सैदेव अपेक्षित रहेगा….

sanjeev sharma के द्वारा
February 16, 2011

हिमांशु जी, आपकी अपील पर मिली इन ढेरों सकारात्मक प्रतिक्रियाओं से एक बात तो पूरी तरह स्पष्ट हो गई है कि अच्छे लेखन के कद्रदानों की कमी नहीं है.मैं भी आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि निशुल्क मिली इस लेखन सुविधा/मंच का इस्तेमाल सार्थक और प्रेरक लेखन के लिए होना चाहिए न कि समय और जगह की बर्बादी के लिए. वैसे कहीं-कहीं लगती टिप्पणियों की मंडी से कही न कही गुट में बंटते ब्लागरों की भनक लगती है और हमारे कई साथी पिछले दिनों हुए एक बैठक में इस पर चिंता जाहिर कर चुके हैं.आपके माध्यम से मैं भी अपील करना चाहता हूँ कि अच्छे लेखन की सराहना कीजिये पर हर-कुछ को भी इतना मत सराहिये कि अच्छे लेखक भी मायूस होकर हर-कुछ लिखने लगे..बहरहाल एक क्रांतिकारी पोस्ट के लिए बधाई

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 16, 2011

    संजीव शर्मा जी, आपने ब्लाग जगत की दुखती रग पर हाथ रखते हुए अपनी टिप्पणी दी है । एक तरफ़ जहां लेखकों की हौसला अफ़ज़ाई और स्वस्थ बहस के लिये ब्लाग्स पर टिप्पणियों की अनिवार्यता से इंकार नहीं किया जा सकता, वहीं दूसरी तरफ़ ये टिप्पणियां ही सारे फ़साद की जड़ भी होती हैं । खास कर ऐसी व्यवस्था में जहां सफ़ल या असफ़ल ब्लागर का दर्ज़ा बनाने का मापदंड ब्लाग पर आने वाली टिप्पणियों की संख्या को आधार बनाकर किया जाता हो । मात्र इस वजह से ही लेखक और टिप्पणीकार दोनों को ही अपने ज़मीर से अलग हटकर समझौते करने पड़ते हैं । लेखक कब गुटबंदी का शिकार होकर किस खेमे या धड़े के साथ जुड़ चुका है, इसका पता भी बहुत सारे लेखकों को तब चल पाता है, जब वे इस दलदल में आकंठ उतर चुके होते हैं । टिप्पणियां सबको चाहिये, चाहे वो किसी भी कैटेगरी के लिखने वाले क्यों न हों । एक नया फ़ैशन चल पड़ा है टिप्पणी के नीचे अपना लिंक देने का । हंसी भी आती है, जब अच्छा लिखने वाले भी टिप्पणी के अंत में बड़े दयनीय भाव से अनुरोध करते पाए जाते हैं कि कृपया मेरी दुकान पर भी पधारिये न महोदय ! अब आप इसे क्या कहेंगे ? मैं आपको भी बहुत दिनों से जानता हूं । आप काफ़ी अच्छा लिखते हैं, लेकिन आपको टिप्पणियां नहीं मिलतीं । क्योंकि जब आप किसी को भाव नहीं देते तो कोई फ़्री में आपको कबतक भाव देगा ? कुछ ऐसा ही चलन बन चुका है । आप यदि कुछ दिनों के लिये बीमार पड़ जायं या कहीं बाहर चले जायं तो आपका खेमा दरकने लगता है, सेंधमारी होने लगती है । लौटकर अपने वोट बैंक को दुरुस्त करना पड़ता है । यह सब है तो मज़ेदार, लेकिन अब सूरत बदलनी चाहिये । कैसे बदलेगी, सबको मिलकर सोचना होगा । मात्र एडीटोरियल विभाग में ही एकाध ऐसे विद्वान लेखक हैं, जिन्हें गुटनिरपेक्षता के बावज़ूद थोक के भाव में वोट मिलते हैं । ज़ाहिर है कि सभी रातोंरात उस स्तर के लेखक तो बन नहीं पाएंगे ।

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    संजीव जी…. नमस्कार…. आपने लेख को सराहा इस हेतु आपका आभार… आपका कहना और आपकी चिंताएं जायज हैं लेकिन गुटबंदी की और इतना अधिक ध्यान देने की जरुरत नहीं है क्योंकि ऐसा अक्सर होता है की किसी के विचार आपको प्रभावित करते हैं तो आप उनके लेख रोज पढ़ते हैं… मई भी राजकमल जी, पियूष जी, निशा जी, चातक जी, दिवेदी जी, आकाश जी, वाहिद भाई, खुराना जी, शाही जी, रमेश बाजपेयी जी, सचिन जी, रोशनीजी, अलका जी, अमित जी दुबे जी, पाण्डेय जी और भी अन्य लेखकों के लेख ढून्ढ कर पढता हूँ लेकिन जहाँ पर असहमत होता हूँ वहां पर असहमति दर्शाता हूँ…इस तरह के गुट बनना स्वाभाविक है… यह एक आत्मीयता को दर्शाता है… यहाँ पर हम एक दुसरे से आत्मिक रूप से जुड़ते हैं, एक पारिवारिक सम्बन्ध बनता है… और अच्छा लगता है… रौशनी जी… चातक जी… निशा जी… सचिन जी… और पियूष जी से मैंने फेस बुक पर चैटिंग की है और इतना सुखद अहसास हुआ की जैसे बिछड़े हुए मित्र मिल रहे हों… निशा जी ने मुझसे मेरे काम के बारे में पुचा… मेरे बच्चे की फोटो देखकर उसकी तारीफ़ की… रौशनी जी ने भी इसी तरह काफी देर बात की… बहुत अच्छा और आत्मीयता का अनुभव रहा… अगर ऐसे रिश्ते इस मंच के माध्यम से उभर के आते हैं तो इसे गुटबाजी कहना गलत है… मई तो लेखन की बात कर रहा हूँ… लेखन में अगर मेरी त्रुटी है तो सभी मित्रों को उस और ध्यान दिलाना होगा जिससे मई उसमे सुधार कर सकूँ… यह मेरा कहना है… और कुछ नहीं…

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    मेरा यह मानना है की टिप्पणी के निचे अपना लिंक देना सिर्फ अपने लेख को आप तक पहुंचाने का माध्यम है यह कोई बुरी बात नहीं है आप लिखते इसीलिए हैं की लोग उसको पढ़ें… ऐसा करने से आप लेख को अधिक लोगों तक पहुंचा पाने में समर्थ होते हैं तो इसमें बुराई क्या है … यह मुझे समझ में नहीं आता … यह मुद्दे से भटकने वाली बात है… मुद्दा लेखन और प्रतिक्रियाओं की गुणवत्ता का है…

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 18, 2011

    हिमांशु जी, आपके तर्क़ में वज़न है, इसलिये थोड़ी हिचकिचाहट के साथ स्वीकार कर ले रहा हूं । मेरा व्यक्तिगत विचार है कि यदि मैं अपनी टिप्पणियों के नीचे लिंक देता हूं, तो ऐसा करना मुझे बाज़ारूपन का अनुगामी बना देता है, जो शायद पेशेवर लेखकों के लिये ही उचित है । वैसे व्यक्तिगत विचार व्यक्तिगत ही होते हैं, कोई आवश्यक नहीं कि सभी उनसे इत्तफ़ाक़ रखते हों । बात साहित्य के संरक्षण की है, इसलिये विषय से हटकर है, मानता हूं । बहस में बातों के अन्दर से बातें निकल ही आती हैं ।

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 18, 2011

    आदरणीय शाही जी आपका समर्थन मिला इस हेतु आभार…..

rajkamal के द्वारा
February 16, 2011

भाई साहिब …नमस्कार ! ऐसा लगता है की आपकी छुटिया अभी भी चल रही है …… चलिए इसी बहाने हमको तो बहुत सी काम की बाते पता चल रही है …. इस मंच पर सबसे ज्यादा बार मैंने दुश्मनी मोल ली है , अपने लेखों से + टिप्पणियों से ब्लागरों से और इस जंकशन तक से पंगा लिया है …… हम सही को सही और गलत को गलत कहने वाले चुनिन्दा नामुरादों में शामिल है और रहेंगे ….. आपके सवालों के जवाब वक्त के इलावा और कोई भी नहीं देगा ….. आपके साथ मैं पहले भी था अब भी हूँ और आगे भी रहूँगा

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 16, 2011

    राजकमल जी…. नमस्कार…. मेरा अवकाश अब समाप्त हो चूका है…. लेकिन आज छुट्टी थी इस कारण यह पोस्ट किया था… आप से आशातीत प्रतिक्रिया प्राप्त हुई इस हेतु आभार….

sdvajpayee के द्वारा
February 16, 2011

 हिमांशु जी , आपकी साहित्‍यानुरागी  वृत्ति को सम्‍मान देते हुए किंचित असहमति के साथ निवेदन करना चाहता हूं कि लेखन और साहित्‍य अनिवार्यत: एक नहीं होते। कभी कभी उम्‍दा लेखन भी साहित्‍य के दायरे से बाहर होता है। निजी तौर पर मेरा मानना है कि ब्‍लागिंग साहित्यिक मंच नहीं भाव-विचारों की सहज अभिब्‍यक्ति का माध्‍यम है। इसमें हर तरह के लोग – टाइम पास करने वाले , हास्‍य व मनोरंजन करने वाले , जानकारियां व ज्ञान बढाने वाले, साहित्‍य पिपासा शांत करने वाले – सहभागी होते हैं। दर्शन-चिंतन, अंर्तदृष्टि, संवेदना और भाव प्रवणता के ताप की उच्‍चता ही किसी लेखन को साहित्‍य की सम्‍मानित परिधि में पहुचाती है। साहित्‍य मन,प्राणों का सत्‍व होता है। वह जितना लोक हितार्थ होता है उससे कहीं अधिक स्‍वांत: सुखाय होता है। वह केवल आइना ही नहीं दिखाता ,आगे की सही राह भी बताता है। वह ऋषियों की तरह सत्‍याग्रही और सर्व दृष्‍टा होता है। तभी दिनकर से अधिक उसकी गति होती है। ब्‍लागिंग में साहित्‍येतर लेखन-प्रविष्टियों से साहित्‍य नहीं मर सकता। वह उनमें से भी अपने लिए आवश्‍यक ऊष्‍मा-पोषण निकाल लेगा। साहित्‍य के लिए कभी निरापद मैदान नहीं मिलता। वह कंकरीले-पथरीले मार्गों से ही अपनी यात्रा जारी रखता है।  इस लिए अनुरागियों के लिए साहित्‍य-सुरभि बिखेरते रहें।

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 16, 2011

    बाजपाई जी… आपकी सुंदर प्रतिक्रिया प्राप्त हुई इस हेतु आपका आभार प्रकट करना चाहूँगा…. आप ने उचित ही कहा है की हर प्रकार का लेखन साहित्य नहीं है… लेकिन मै यह जरुर कहना चाहूँगा की जब हम सार्वजानिक रूप से कुछ लिखते हैं… तो उसके प्रति हमारी जवाबदेही होनी चाहिए…. वैसे भी यह एक अनुरोध है… व्यक्ति लेखन के लिए स्वतंत्र है….

Versha के द्वारा
February 16, 2011

जी हिमांशु जी,मैं आपकी बात से सहमत हूँ …की ब्लोगेर भाई बहनों की झूटी तारीफें नही करनी चाहिए ….मैं आप सब से बहुत छोटी हूँ ,और मुझे बहुत अच्छा लगता है ,जब आप जैसे इतने उच्च कोटि के लेखक भी ,मेरी कविता व हास्य व्यंग पढ़कर ,उस पर अपनी कीमती टिपपणी देते है ,,,मेरे लिए तो ये एक सौभाग्य की बात है , की जागरण कांटेस्ट की कृपा से …..इस बेकार velantien डे पर्व में , मुझे अपनी प्रतिभा दिखने का मौका मिल गया ,,कम से कम मैंने अपने आप को कुछ तो पहचान दे पाई . मौत उनकी है जिनको करे ज़माना याद यूँ तो आते हैं सब यहाँ मरने के लिए.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    वर्षा जी…. आपने इस पोस्ट पर आपना सहयोग दिया… यह आपकी जागरूकता को दर्शाता है…. मै कोई उच्च कोटि का लेखक नहीं हूँ… यह तो आपका प्यार है जो ऐसी बात कह जाता है…. आप इस मंच पर नयी हैं … और आपको यह जानकार हर्ष होगा की मै भी अभी नया ही हूँ… इस भाई की और से आपको हमेशा अच्छा लेखन के लिए सहयोग मिलेगा….

baijnathpandey के द्वारा
February 16, 2011

आदरणीय हिमांशु जी सादर अभिवादन आपने साहित्य की दुर्गति की जो बातें कही है वह बिलकुल हीं सही है | साहित्य अपनी पकड़ खो रहा है …..इसके लिए कुछ तो आधुनिक संस्कृति दोषी है ………किन्तु हमारा दामन भी साफ़ नहीं है | साहित्य का कार्य है की वह जनमन के सोंच को एक सकारात्मक दिशा प्रदान करे | हम सभी साहित्यकारों को ज्यादा जिम्मेवार होना पड़ेगा अन्यथा ………………

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    पाण्डेय जी…. अपनी समस्याओं के लिए सिर्फ और सिर्फ हम ही जिम्मेदार हैं….. आपके अमूल्य और अपेक्षित सहयोग के लिए आपका बहुत बहुत आभार……

ashvinikumar के द्वारा
February 16, 2011

हिमांशू जी यही तथ्य भाई राघवीर चौहान जी ने भी रखे थे,लेकिन मंच पर जूं तक नही रेंगी ,हालांकि वह केवल ब्लागिंग ही नही समूचे साहित्य जगत को वार्ता के मंच पर ले आये थे ,शायद आज कल साहित्य की परिभाषा परिवर्तित हो गयी है मे मानता हूँ की यह सामाजिक मंच है सभी अपने विचारों को उन्मुक्त ढ़ंग से रख सकते हैं लेकिन एस उन्मुक्तता की भी कोइ ल्क्छ्मन रेखा निर्धारित होनी चाहिए अन्यथा यह उन्मुक्तता ब्लागिंग की दुनिया जो अभी शैशवा अवस्था में ही है प्रोढ़ होने से पहले ही इतनी विकृत न हो जाए कि इसमे से सड़ांध फूटने लगे,ब्लागिंग की दुनिया साहित्य का ही एक अंग है सुसभ्य साहित्य का ,,आपने अपने लेख में ही इतना कुछ लिख दिया है कि कुछ लिखने के लिए बाकी ही नही बचा है ……जय भारत

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 16, 2011

    हिमांशु भाई, अपने पोस्ट पर आपकी कमेन्ट ये लिंक मिला. बहुत ही अच्छी बातें उठाई हैं आपने. यहाँ पर इतने वरिष्ठ और प्रतिष्ठित ब्लॉगरों की प्रतिक्रियाएं हैं कि मेरे कहने के लिए कुछ बचा नहीं. फिर भी अश्विनी भाई और शाही जी के विचारों से मैं भी कुछ साम्य रखता हूँ. अभी अच्छे साहित्यकार मौजूद हैं जो दिल की आवाज़ पर ही काम करते हैं बाज़ार नहीं देखते भले ही वो आज दुर्दशा में हों..पर हम-आप जैसे लोग कुछ तो कर ही सकते है..एक छोटा सा क़दम ही कारवां का आगाज़ होता है. आभार सहित,

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    जी हाँ अश्विनी जी… लक्ष्मण रेखा की नितांत आवश्यकता है……

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    वाहिद जी आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया और सहयोग हेतु धन्यवाद……

chandra shekhar sen के द्वारा
February 16, 2011

bhai himanshug, sadhuwad. main iss munch ke liye naya hoo, per isse pad kar laga sub apne hee hai. vigat kafi dino se valentine day ki bakwas padne ko mil rahi thee. yadi ase break nahi likhe jayenge tho shayad aane wale dino me sheela-day or munni-day manaya jayega. sadhuwad

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    चन्द्र शेखर जी….. आपका बहुत बहुत धन्यवाद………

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 18, 2011

    महोदय में लेखन के नाम पर हो रहे इस और गंदे मजाक से आहत हूँ… आप कुछ भी करने और लिखने के लिए स्वतंत्र अवश्य हैं… लेकिन अगर आप कुछ कहते या लिखते हैं तो उसके सर्थन में आप के पास कुछ तो होना ही चाहिए… स्वयं को आम आदमी कह कर आप बच नहीं सकते हैं अपनी जिम्मेदारियों से….

    chandra shekhar sen के द्वारा
    February 23, 2011

    mahoday, main aapse poori tarah sahmat hoo. mujhe sahitaya ki jayada samajh nahi hai, per main apna heet samajhta hoo. sahitaya ko jagrat karne ki aapki muheem me main aapke sath hoo. meri shubhkamnaye.

nishamittal के द्वारा
February 16, 2011

नमस्कार हिमांशु जी,आपके सारगर्भित विचारों से भरपूर लेख पढ़ा .साहित्य की गरिमा बनाये रखना जरूरी है और इसके लिए मंच ने जो सुअवसर प्रदान किया है उसका सदुपयोग करना चाहिए.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    आदरणीय निशा जी….. आपका इस पोस्ट पर अमूल्य मत प्रदान करने के लिए आभार……

आर.एन. शाही के द्वारा
February 16, 2011

हिमांशु जी, समस्या को आपने मौलिक रूप में अभिव्यक्ति दी है । साहित्य की उत्कृष्टता को बरक़रार रखना हर ज़िम्मेदार लेखक का परम कर्त्तव्य है, परन्तु दुर्भाग्य से हर लिखने वाला ज़िम्मेदार लेखक नहीं हो सकता । इसमें ढेर सारे पेंच हैं । शायद यही कारण है कि जागरण के अतिरिक्त किसी और राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के अखबार ने अभी तक रीडर्स को टिप्पणियों के अलावा मुक्त रूप से ब्लाग और टिप्पणियां दोनों बिना काट-छांट के पब्लिकली पब्लिश करने की सुविधा प्रदान करने का जोखिम नहीं लिया है । इस दृष्टिकोण से देखा जाय तो जागरण ने वह साहस कर दिखाया है, जो अभी तक के पोर्टफ़ोलियो में दुर्लभ है । इस साहसिक कदम से साहित्य को तो बहुत ज़्यादा नहीं, लेकिन हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी को सीधे तौर पर जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हो रहा है, उसकी अनदेखी भी नहीं की जा सकती । आपने भी मार्क किया होगा कि कोई नया टूटा फ़ूटा सा लिखने वाला ब्लागर आता है, और देखते-देखते कुछ सप्ताह और महीनों में ही उसकी भाषा-शैली और व्याकरण दोनों ही परिपक्व होकर काफ़ी समृद्ध हो जाते हैं । क्या यह उपलब्धि देश के लिये सकारात्मक और उत्पादक नहीं है ? इसके सापेक्ष भी गौर करना होगा । खुद मेरा अपना अनुभव भी मुझे आज कम संतुष्टि नहीं दे रहा । आज आप जिन कुछ चुनिन्दा लड़कों की रचनाओं की भूरि-भूरि प्रशंसा करते नहीं अघाते, मैंने और सभी ने उनके अंदर होने वाले क्रमिक विकास को काफ़ी क़रीब से देखा है । जब कभी किसी ने ज़मीन छोड़ने की कोशिश की, सभी निष्ठावान ब्लागर्स और खुद मंच ने भी उसकी तीव्र भर्त्सना कर उसे वापस ज़मीन पकड़ने पर बाध्य किया है । लेकिन फ़िलहाल ब्लागर्स की बढ़ती भीड़ और कई प्रकार के नए लेखकों के बड़े पैमाने पर ज्वाइनिंग के कारण आप के द्वारा रेखांकित की गई समस्याएं भी बेशक बढ़ रही हैं । लेकिन यहां भी एक सकारात्मक तथ्य है कि इधर नवोदितों के रूप में मंच ने कई लेखकीय प्रतिभाओं से भी परिचय पाने का सौभाग्य प्राप्त किया है । मैं इस मामले में नीचे श्री राजीव दुबे जी की टिप्पणी के वाक्य \’जो मूल्यवान होगा वह स्वतः ही दीप्त हो दीर्घायु होगा और जो निःसार होगा वह समय के गर्त में खो जाएगा\’, से पूर्णतया सहमत हूं । शेष काम आपका यह ओजस्वी आलेख और उसमें निहित अपील भी करेगी ही, हमें ऐसी प्रत्याशा अवश्य रखनी चाहिये । साधुवाद ।

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    शाही जी…. सादर प्रणाम…. आपकी मार्ग दर्शन करती हुई विस्तृत प्रतिक्रिया प्राप्त हुई … यह मेरा सौभाग्य है… इसी प्रकार का मार्ग दर्शन हम सभी नवोदित लेखकों को अपेक्षित रहेगा… शायद मेरा अधिक जोश ही मुझसे इस प्रकार के पोस्ट या प्रतिक्रियाएं लिखवा डालता है… आपकी सारी बातें मेरे लिए विचारणीय हैं… मै इनका ध्यान रखूँगा… आभार….

Deepak Sahu के द्वारा
February 16, 2011

हिमांशु जी! नमस्कार ! आपका कहना बिलकुल सत्य है की ब्लॉग मे अगर कोई त्रुटि है दूसरे ब्लॉगर को उस ब्लॉग मे आलोचत्मक प्रतिकृया देनी चाहिए नाकी उसे सही ठहराकर उसपर पर्दा डाल देना!

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    दीपक जी….. नमस्कार….. आपके सहयोग और समर्थन हेतु आपका आभार……..

allrounder के द्वारा
February 16, 2011

हिमांशु जी नमस्कार, सबसे पहले तो आपको हार्दिक बधाई देना चाहूँगा जो आपने इतनी हिम्मत दिखाई जो इस प्रकार की प्रकृति के ब्लोगर्स की और ऊँगली उठाई, अधि चर्चित, अधि मूल्यित मैं शामिल होने के लिए जिस प्रकार के हथकंडे अपनाये जा रहे है, सच मानो तो मेरे विचार से इनका औचित्य ही ख़त्म हो गया है ! रही बात ब्लोग्स लिखने और शीर्षक की तो जैसे शीर्षक आ रहे है लगता है कोई सेंसर बॉडी स्थापित करनी होगी JJ को ! और उसके बाद कमेन्ट के तो कहने ही क्या ? कहने वाला कह गया दो हिचकियों में राज ए दिल लोग पीछे मुद्दतों तक गुफ्तगू करते रहे. इससे ज्यादा कुछ नहीं लिखा जा सकता ! अब बात आती है साहित्य सेवा की तो यहाँ हर कोई अपनी रूचि और मिजाज के हिसाब से लिखता है, और इस ब्लोगिंग से साहित्य की कौन कैसे सेवा कर रहा है ये, बहुत ही सोचनीय प्रश्न है, इसका जवाव तो बहुत ही मुश्किल है ! बशर्ते जिस मंच पर हम लिख रहे है, उस मंच की गरिमा और मर्यादा को बरक़रार रखना सारे ही ब्लोगर्स का दायित्व है, चाहे वे जूनियर हों या सीनिअर ! यधपि जिन बिन्दुओं पर आपने इशारा किया है उन सब हथकंडों के लिए जूनियर नहीं सीनिअर को ही जिम्मेदारी लेनी होगी, क्योंकि जूनियर वही करता है, जो सीनिअर को करते देखता है ! और यहाँ तो उसे कुछ करने की जरुरत ही नहीं बाकायदा कुछ कोचिंग इंस्टिट्यूट चल रहे है एक प्रतिष्ठित ब्लोगर्स बनाने के, और इनकी फीस भी ज्यादा नहीं है, सिर्फ इन्हें नए ब्लोगर्स का God Father बनने का जूनून है ! एक और बात मैं कहना चाहूँगा जो बिंदु आपने उठाये है JJ की भी इस पर कुछ जिम्मेदारी बनती है, और ये देखना काफी रोचक होगा की JJ आपकी इस पहल को किस प्रकार से लेता है ! बाकी ब्लोगर्स को उनकी मर्यादा और जिम्मेदारी समझाने की जिम्मेदारी लेने के लिए आगे आने के लिए मेरी और से आपको सत-सत नमन !

    Amit Dehati के द्वारा
    February 16, 2011

    आदरणीय सचिन जी प्रणाम ! मैं पूर्ण रूप से सहमत हूँ आपके इन विचारों से ………बिल्कुल सही कहा आपने गाड फादर ….JJ के कार्यकर्त्ता गण को इस मामले में दखल जरुर देना चाहिए !!!!!

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    सचिन जी और अमित जी आप दोनों का इस पोस्ट पर पधारने और अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया प्रदान करने के लिए आभार….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 18, 2011

    सचिन जी मेरा तो मानना है की जागरण ने हमें यह मंच उपलब्ध कराया है अब हमारी जिम्मेदारी है की हम कैसे इसको निभाते हैं…..

Alka Gupta के द्वारा
February 16, 2011

हिमांशु जी , अच्छे साहित्य सृजन के लिए उसकी गरिमा व जीवन्तता बनाये रखना बहुत जरूरी है साहित्य के प्रति अच्छे विचार अच्छा लेख है !

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    धन्यवाद अलका जी…. इसी प्रकार स्नेह बनाए रखियेगा…..

shab के द्वारा
February 16, 2011

kehne wala keh gaya…wah kya baat hai, bahut achchi apeal…

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    आपके इस पोस्ट पर समर्थन हेतु आभार…..

RajniThakur के द्वारा
February 16, 2011

हिमांशु जी , साहित्य के हितार्थ एक प्रेरक पोस्ट ..इस पहल के लिए बधाई.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    रजनी जी…. प्रतिक्रिया हेतु आभार….

rajeev dubey के द्वारा
February 16, 2011

हिमांशु जी, निश्चय ही आपकी भावना उत्कृष्ट है…अब रही बात उच्च कोटि के साहित्य सृजन की तो आप मानेंगे कि यह तो लेखक पर ही निर्भर करता है…आप कितनी भी गुहार लगायें, लेखक वही लिखेगा जो उसकी रूचि और प्रतिभा के अनुकूल होगा. और फिर ब्लॉग एक मुक्त माध्यम है, संपादक, प्रकाशक से मुक्त. लेखक और पाठक के बीच मुक्त सम्बन्ध. ऐसे में जो जैसा चाहे प्रस्तुत कर ही सकता है. हम सभी को अपनी अपनी समझ के अनुसार अपना कार्य करते रहना चाहिए, उसमें से जो मूल्यवान होगा वह स्वतः ही दीप्त हो दीर्घायु होगा और जो निःसार होगा वह समय के गर्त में खो जाएगा…

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 16, 2011

    राजिव जी…. आपका यह कथन जो मूल्यवान होगा वह स्वतः ही दीप्त हो दीर्घायु होगा और जो निःसार होगा वह समय के गर्त में खो जाएगा बिकुल सत्य है… और आशा की एकमात्र किरण है….

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 16, 2011

श्री हिमांशु जी, मुझे भी इस कांटेस्ट के बीच में कुछ अटपटा सा लगा…मगर मानव स्वभाव के अंतर्गत मै भी बह गया…शायद मैंने कुछ गलत किया है और खुद को गलत भी महसूस कर रहा हूँ..अब पछता रहा हूँ… बहुत ही सत्य लेख…. आकाश तिवारी

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    आकाश जी आप क्या कह रहे हैं कुछ स्पष्ट नहीं हो रहा है…. लेख की सराहना करने के लिए आपका आभार….

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    February 18, 2011

    श्री हिमांशु जी, मै अपनी कहानी सार्वजनिक नहीं करना चाह रहा था..मगर भावनाओं में बह गया… आकाश तिवारी

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 18, 2011

    आकाश जी…. लेखन की दृष्टि से आपकी रचना उत्तम थी….. लेकिन यह आपकी निजी जिन्दगी से सम्बंधित रचना थी इसलिए इसको सार्वजानिक करना या न करना आपके विवेक पर निर्भर करता है….

priyasingh के द्वारा
February 16, 2011

आपके इस लेख का अभिप्राय मेरी समझ में आ रहा है ….और आपको अपना अभिप्राय समझाने का प्रयास जरुर करुँगी अपने अगले ब्लॉग में ………… वैसे तो आप मेरे विचारों से सहमती नही रखते है परन्तु फिर भी लिखूंगी जरुर ………. अर्थपूर्ण लेख ……….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    प्रिया जी… यह बात गलत है की आप बुरा मान रही हैं…. किसी एक विचार से असहमत होने का यह अर्थ मत निकालिए की आपके सभी विचारों से असहमत हूँ… हो सकता है की आप जिस परिपेक्ष्य में वह लेख लिख रही हों… वह समझ पाने में मै असमर्थ रहा हूँ… या शब्दों के चयन में आपसे गलती हो गयी हो… यह सब बातें इस सिखने के दौर में होती हैं… कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है… जहाँ तक आपके लेख का प्रश्न है… कुछ शब्दों को लेकर ही मुझे आपत्ति थी सारे लेख से नहीं… आप जरुर लिखें… और अर्थपूर्ण लिखें… आपका स्वागत रहेगा… मै फिर हाज़िर रहूँगा प्रतिक्रिया देने के लिए…. बच कर रहिएगा प्रिया जी…. आपका आभार…

February 16, 2011

हिमांशु जी बहुत ही सार्थक और विचारणीय लेख……

    February 16, 2011

    हिमांशु जी वैसे तो संक्षिप्त प्रतिक्रिया मैं पहले ही दे चुका था, पर अपने लेख पर जाकर आपकी प्रतिक्रिया देखी तो फिर से प्रतिक्रिया दे रहा हूँ. वैसे तो आप सभी कुछ लिख ही चुके हैं तो कुछ कहने की गुंजाईश नहीं है. पर कुछ बातें मेरे मन में भी हैं……जो कि समय आने पर मैं अपने ब्लॉग के माध्यम से लिखने कोशिश करूंगा.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    राजेन्द्र जी…. आपका आभार…. आपके समर्थन हेतु…. धन्यवाद.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 18, 2011

    आप अपनी बातों को अव्य्श्य ही मंच पर रखें….

February 16, 2011

भाई हिमांशु जी, साहित्य से जुडे,बहुत ही महत्वपूर्ण सवालों को आपने अपने लेख में उठाया हॆ.साहित्य की परिभाषा भी यही हॆ-’हितेन सह हितम तस्य भाव: साहित्यम’ अर्थात समाज के हित के लिए,लोक-कल्याण की भावना से लिखा जाने वाला लेखन ही,साहित्य हॆ.आज के लेखन पर बाजारवाद हावी हो गया हॆ,पॆसे व सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में कुछ लेखक-जन-हित की भावना को तिलाजंली दे चुके हॆं.इस तरह का लेखन कुछ समय के लिए वाह! वाही!! अवश्य दिलवा सकता हॆ-लेकिन साहित्य की श्रेणी में कभी नहीं आ सकता.साहित्य से जुडे महत्वपूर्ण सवालों पर भी चर्चा-इस मंच के माध्यम से की जानी चाहिए.आपने एक अच्छी शुरुआत की हॆ.धन्यवाद!

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    आदरणीय विनोद जी…. नमस्कार….. आपकी बहुमूल्य प्रेरक टिप्पणी प्राप्त हुई…. इस हेतु आभार….

deepak pandey के द्वारा
February 16, 2011

हिमांशु जी, अच्छे लगे आपके विचार. कहते हैं की साहित्य को जिन्दा रखने के लिए लेखक , पाठक और आलोचक तीनो की आवश्यकता होती है. हम तो विशेषकर पढने वालों में से है जो कभी कभार लिख भी लेते हैं. आपके सुझाव प्रेरक हैं विशेष कर लेखको और आलोचकों के लिए . साहित्य का जिन्दा रहना बहुत जरुरी है अगर हमें संस्कृति को जिन्दा रखना है. बस इन सुझाव पर अमल जरुरी है. उत्तम विचार , साधुवाद.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    दीपक जी…. नमस्कार….. आपके सहयोग और समर्थन हेतु आपका आभार………

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 16, 2011

आदरणीय हिमांशु जी…… आपने राजकमल जी की कुछ बातों को बड़ी ही गंभीरता से ले लिया है शायद…… जैसे की JJ की तारीफ कोई सामाजिक सन्देश और कुछ लेखकों की और उंगली उठाने से आपके ब्लॉग न केवल फीचर्ड होंगे अपितु JJ आपसे हमेशा खुश रहेगा….. कुल मिला कर सार्थक लेख के लिए बधाई………..

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 17, 2011

    पियूष जी….. नमस्कार….. आपके सहयोग और समर्थन हेतु आपका आभार……..


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