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प्यार का केमिकल लोचा

Posted On: 7 Feb, 2011 Others में

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प्रिय पाठकों….. यह तो हम सबने पढ़ा …. सुना …. देखा और महसूस किया है कि प्यार हो जाने की स्थिति में व्यक्ति का दिल उसके दिमाग पर हावी हो जाता है…. और इस बात के वैज्ञानिक प्रमाण भी मौजूद हैं कि प्रेमियों की दुनिया में दिमाग बिलकुल अलग तरीके से कार्य करता है…. यही है प्यार का केमिकल लोचा…. अब तो विज्ञान भी प्रेम के होने के प्रमाण जूता रहा है…. आखिर क्या है यह प्यार का केमिकल लोचा?


डोरोथी टेनाय नाम के एक मनोचिकित्सक ने 400 लोगों का अध्ययन कर यह पता लगाने की कोशिश की कि पहला प्यार होने पर उन्हें कैसा महसूस होता है…. उसके इस वैज्ञानिक प्रयोग में सभी ने इस बात को स्वीकार किया कि प्यार का वह अहसास होते समय उन्हें यह महसूस हुआ कि वे जैसे हवा में उड़ रहे थे ….. यह एक सर्वथा अलग किस्म का अहसास है …. पूरे शरीर में एक नशा… और अपने प्रिय के अहसास मात्र से दिल की धड़कन में खास बदलाव…. वैज्ञानिकों ने अपने विभिन्न प्रयोगों और शोधों द्वारा प्यार कि इन ख़ास क्रियाओं को समझने का प्रयास किया है…. जिससे पता चल सके कि आखिर इस प्यार का केमिकल लोचा है क्या?

वैज्ञानिक … ‘फिनाइल इथाइल एमाइन’ …या…. ‘पीईए’ रसायन को ‘लव रसायन’ के रूप में जानते हैं… यही वह रसायन है जो रोमांस के समय उत्तेजना पैदा करता है…. प्यार होने के समय या कहें अपने प्रेमी को देखते समय जब इस रसायन का स्राव होता है तो इसका असर पूरे शरीर में दिखाई पड़ता है…. उदाहरण के तौर पर शरीर की इंद्रियाँ इतनी क्रियाशील हो जाती हैं कि कम रोशनी में भी सब कुछ साफ-साफ दिखाई पड़ने लगता है…. या…. जिस समय आप घर में ऊँघ रहे होते हैं…. इस रसायन के प्रभाव के कारण…. उस समय चुस्ती का अहसास होता है.

यह रसायन एनी क्रियाओं में भी सहायक होता है… जैसे… तेज झूला झूलते समय… ऊँचाई से नदी में छँलाग लगाने पर…. या तेज गति से वाहन चलाते समय शरीर में एक विशेष प्रकार की उत्तेजना होती है…. शोधकर्ताओं का मानना है कि यह आनंद ऐसे ही रसायन के कारण होता है.

‘पीईए’ से एक अवयव न्यूरोकैमिकल डोपामाइन भी निकलता है… प्रेम-प्यार में इसकी क्या भूमिका हो सकती है हाल ही में इसका रोचक प्रयोग भी हुआ है…. चूहों के अंदर सूँघकर पता लगाने की असाधारण क्षमता होती है….. तमाम रोगों के अलावा अपने साथी को प्रजनन के उपयुक्त होने न होने का पता भी चूहे सूँघकर लगा लेते हैं….. एक प्रयोग में शोधकर्ता, चूहों के एक समूह में जिस किसी को भी डोपामाइन की अतिरिक्त मात्रा इंजेक्शन से दे दी जाती थी, मादा चुहिया उसे प्रजनन के लिए चुन लेती थी…. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो नर चूहे को मादा चुहिया द्वारा प्रजनन के लिए चुना जाना इस बात पर निर्भर करता था कि उसके अंदर डोपामाइन का अतिरिक्त रिसाव हो रहा है कि नहीं.

इसी डोपामाइन से ऑक्सीटोन नामक रसायन निकलता है…. महिलाओं में बच्चा पैदा करने और बच्चों को दूध पिलाते समय इस रसायन का बहुत महत्व होता है… शोधकर्ता मानते हैं कि प्रेमियों के आपस में एक-दूसरे को बाँहों में भर लेने और चूमते समय निकलने वाले ये रसायन वास्तव में महिलाओं को मातृत्व की तैयारी करवा रहे होते हैं…. इन रसायनों को पालन-पोषण करने वाला रसायन भी कहा जाता है.

इसी तरह शोधकर्ताओं ने प्यार करने वालों के दिल में धक्-धक् होने का वैज्ञानिक कारण भी खोज निकाला है…. जब प्रेमी एक दुसरे के नजदीक आते हैं….. तो उनका दिल तेजी से धड़कने लगता है… विशेषज्ञ कहते हैं कि इस समय मस्तिष्क में नोरेपाइनफ्रीन नामक रसायन का स्राव हो रहा होता है…. यही रसायन एड्रेरनालाइन हारमोनों को उत्तेजित कर देता है… इसके ही प्रभाव से जब प्रेमी अथवा प्रेमिका एक-दूसरे के पास पहुँचते हैं तो उनका दिल तेजी से धड़कने लगता है.

प्रेमियों के संसार में एक बिल्कुल अलग तरह का मस्तिष्क काम करता है… इस स्थिति को कहा जा सकता है कि ऐसे समय दिल, दिमाग पर हावी हो जाता है… इसके वैज्ञानिक प्रमाण भी मौजूद हैं…. हम अपने सामान्य क्रियाकलापों के लिए दिमाग के ‘कोरटेक्स’ क्षेत्र का इस्तेमाल करते हैं जबकि भावनात्मक निर्णयों के लिए ‘लिम्बिक तंत्र’ जिम्मेदार होता है… जब हम रोमांस के समय मनुष्य के अंदर जिस पीईए रसायन के स्राव की बात करते हैं वस्तुतः ये सब रसायन लिम्बिक तंत्र में ही अपना असर दिखाते हैं.

यदि प्यार-मोहब्बत से थोड़ा बाहर जाकर बात करें तो योद्धाओं को जब बहादुरी दिखाने का समय आता है तो ऐसे ही कुछ अन्य तरह के रसायन ही मस्तिष्क के लिम्बिक तंत्र को अपनी पकड़ में ले लेते हैं…. और सरल भाषा में कहा जाए तो भावनात्मक संबंधों के समय मनुष्य का लिम्बिक तंत्र वाला हिस्सा अचानक सक्रिय हो उठता है…. वैज्ञानिक दृष्टि से कहा जाए तो वहाँ दिल, दिमाग में नहीं बल्कि छाती में पसलियों के बीच कहीं पंप की तरह खून धौंकने में लगा होता है.

धीरे-धीरे दिमाग इन रसायनों का आदी हो जाता है …..और पहली मुलाकात की तरह प्रेमी-प्रेमिकाओं का दिल नहीं धड़कता… तब काम आता है आपके स्वभाव की गंभीरता, धीरज और विश्वास…. जिनके पास यह नहीं होता वे अपना प्यार खो देते हैं…..

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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajeev dubey के द्वारा
February 9, 2011

ओह हो …बड़ी रासायनिक बात कह दी अपने … लेकिन लगता है कि यह काफी डायनेमिक भी होगी…अच्छा लेख.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 10, 2011

    धन्यवाद दुबे जी……………………….. आभार……………..

chaatak के द्वारा
February 8, 2011

स्नेही हिमांशु जी, आपने तो प्रेम का सारा रसायन विज्ञानं ही उड़ेल दिया| बड़ी अच्छी जानकारी दी है आपने मैं तो समझता था प्रेम कोई परामानवीय लोचा है लेकिन आज पता चला कि सारा केमिकल लोचा है| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    चातक जी नमस्कार….. आपका आभार …..

rajkamal के द्वारा
February 8, 2011

अगर पहले पता होता कि इतनी पेचीदगिया है तो हम प्यार तो क्या जन्म ही नहीं लेते …. जिनको हम आनंद दायक मानते थे उन सभी के आपने कितने खतरनाक नाम बताए है … फिर भी धन्यवाद

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    राजकमल जी…. प्रेम भरा नमस्कार….. आप जन्म नहीं लेते तो ब्लॉग्गिंग का इतना आनंद नहीं आता….

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 7, 2011

आपकी सभी रचनाओं मे एक गहरा विश्लेषण छुपा होता है…….. चाहे फिर वो आध्यात्म पर हों या धन पर या फिर प्रेम पर………. हर बार आप चयनित विषय के साथ पूर्ण न्याय करते नज़र आते हैं…….. एक ओर सुंदर रचना के लिए बधाई…….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    पियूष जी …. धन्यवाद…. अब तो हर रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहता है….. आभार…

nishamittal के द्वारा
February 7, 2011

हिमांशु रासायनिक विश्लेषण प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद.शुभकामनाएं.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    निशा जी….. आपके सहयोग और स्नेह हेतु एक बार पुनः आभार…..

Bhagwan Babu के द्वारा
February 7, 2011

इन वैज्ञानिको ने प्यार को भी नही छोड़ा इसका भी अनुसन्धान कर डाला जानकारी देने का शुक्रिया

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
February 7, 2011

ज्ञानवर्धक लेख के लिए बधाई

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    नमस्कार पाण्डेय जी….. पोस्ट पर प्रतिक्रिया देने के लिए आभार….

Deepak Sahu के द्वारा
February 7, 2011

महोदय जी!  वैसे यह काफी अच्छी खोज है यह! कृपया एक नज़र इधर डालकर मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान करें— http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/2011/02/05/%E0%A4%95%E0%A4%A0%E0%A4%BF%E0%A4%A8-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%A1%E0%A4%97%E0%A4%B0-%E0%A4%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AF%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A4%B0-valentine-c/ दीपक

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    धन्यवाद दीपक जी…..

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 7, 2011

श्री हिमांशु जी, अगर हमसब प्यार को साइंस की नजर से देखने लगेंगे तो प्यार में भावनाओं का अंत हो जाएगा… शुभकामनाओं सहित आकाश तिवारी

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    आकाश जी…. आपका कथन सही है….. धन्यवाद.

NIKHIL PANDEY के द्वारा
February 7, 2011

हिमांशु जी प्रेम का कैमिकल लोचा ये बताता है की दोष हमारा नहीं ,,,,अन्दर का लोचा है ये…. बहुत ही अर्थपूर्ण जानकारी दी है आपने …मै भी सोचता था कुछ तो लोचा है

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    नमस्कार निखिल जी….. आपके स्नेह और प्रेम के लिए शुक्रिया……

Vipin C. Joshi के द्वारा
February 7, 2011

हिमांशु जी आपकी प्रेम के प्रति एक वैज्ञानिक प्रस्तुति तथा शोध वास्तव मैं उल्लेखनीय है……आप प्रेम के विषय मैं इतना ज्ञान रखते है तो क्या आप स्वयं भी इसे प्रक्टिकल मैं ला पाते हैं…..कभी प्यार की गहरे मैं तो उतर के देखो मेरे दोस्त…..कोई रसायन नहीं बल्कि स्वयं प्रेम रस बहता नज़र आयेगा…… ज्ञानवर्धक लेख पर मेरी और से आपको बंधाई हो.तथा साथ मैं प्रतियोगिता के लिए मेरी शुभकामनाएं….इसके अतिरिक्त मेरे से पहले किसी सज्जन…श्रीमान देवेन्द्र जी की प्रतिक्रिया पड़ी …..पड़कर मुझे स्मरण हुआ की शायद मैंने भी उनके लोकल पत्रिका मैं कई शोध पत्र पड़े हैं….मैं इनके मानसिक स्तर की दाद देते हुए भविष्य में इनके लिए भी शुभकामनाये भेजता हूँ……

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    धन्यवाद विपिन जी…. मंच पर पधार कर मेरे लेख पर प्रतिक्रिया देने के लिए…. आप अपने कीमती समय से मेरे लिए वक़्त निकल कर मेरे लेख को पढ़ते हैं…. यह आपका स्नेह है…. इसी प्रकार आपना स्नेह बनाये रखियेगा…. आभार….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    विपिन जी देवेन्द्र जी के बारे में लिखी गई आपकी टिपण्णी आपके SENSE OF HUMOR का परिचय देती है… उनको वाकई भविष्य के लिए शुभकामनाओं की जरुरत है…. धन्यवाद.

Devendra Singh Bisht के द्वारा
February 7, 2011

हिमांशु जी आपकी ये सभी बातें किताबी ज्यादा प्रतीत होती है क्योंकि जब मैंने प्यार किया था तो इनमे से यह कुछ भी महसूस नहीं हुआ कि जैसे मैं तथा मेरी प्रेमिका जो हाल मैं मेरी धरमपतनी हैं हवा में उड़ रहे थे ….. यह एक सर्वथा अलग किस्म का अहसास था …. पूरे शरीर में एक नशा… और अपनी प्रेमिका के लिए ऐसा कोई भी रसायन स्रावित नहीं हुआ था…..यहाँ मैं यह भी बता दूँ की मैं एम.एस.सी. मैं गोल्ड मेडलिस्ट हूँ….तथा मैं इस प्रकार की कई उल्लेखनीय शोध भी कर चूका हूँ…..वैसे आपका ये लेख फूहड़ता से भरा हुआ लगता है तथा यहाँ सार्वजनिक रूप से लिखने लायक नहीं था….

    rktelangba के द्वारा
    February 9, 2011

    हिमांशु जी ने सत्य को जानने का जतन किया है. चूँकि विज्ञानं भी पूर्ण सत्य नही है , यह सत्य की खोज है और लगभग सत्य के नजदीक है. हर एक्शन के पीछे कुछ कारण होते हैं. अगर जान गये तो विज्ञान, वर्ना भगवान. .. जो प्रेम हम करते हैं या हमे हो जाता है उस के पीछे प्रकृति का बहुत बड़ा हाथ है. प्रकृति यानि कुदरत जैव प्रक्रिया को निरंतर बनाये रखने के लिए प्रेम जैसी भावनाओं को उत्प्रेरित करता है. वैज्ञानिक नज़रिए से देखें तो इंसान या कोई भी प्राणी एक सेक्सुअल बाई – प्रोडक्ट है. . कुदरत ने जीवन प्रक्रिया को निरंतर बनाये रखने के लिए सेक्स में आनंद रख दिया .. अब प्राणी उस आनंद की अनुभूति के लिए सेक्स करता है न कि जैव उत्पति के लिए .. प्राणी करता कुछ है और नतीजा कुछ और निकलता है. .. हम इंसानों के मामले में भी प्रेम या प्यार कुदरत के द्वारा थोपी गयी प्रक्रिया का नतीजा है… जब तक हम इस से अनजान हैं तब तक ठीक है. जिस दिन पार्ट उघड जायेगा इस पर से तो उस दिन प्रेम स्वत: विदा हो जायेगा .. !!

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    आदरणीय देवेन्द्र जी…. बातें तो सभी किताबी ही होती हैं…. आपको सिर्फ प्रतीत हुई…. महान आश्चर्य! … आप कह रहे हैं की जब आपने प्यार किया था…… इसका अर्थ यह भी निकलता है की अब आप प्यार नहीं करते हैं….. देवेन्द्र जी यह है बाल की खल निकलना….. आप कहते हैं की जब आप प्यार कर रहे थे तो कोई रसायन का स्राव नहीं हुआ…. आप अपना रासायनिक परिक्षण कर रहे थे या प्यार…. जनाब ये रसायन ही तो आपकी प्यार की क्रियाओं को उद्दीप्त करते हैं… एक बात और कहना चाहूँगा यह मेरी खोज नहीं है…. मैंने तो वैज्ञानिकों द्वारा किये गए शोध पर यह पोस्ट लिखा है…. RAHI बात AAPKE गोल्ड मेडलिस्ट होने की तो भाई साहब आपके कम्मेंट देने से तो आपके पढ़े लिखे होने का भी प्रमाण नहीं मिलता है…. अगर हमारे संसथान ऐसे लोगों को गोल्ड मेडल देते हैं तो देश का भविष्य निश्चित रूप से अंधकार माय है…. जिन लोगों को कुछ लिखने और कहने का सलीका नहीं है और इस तरह के अहंकार और हिन् भावना के शिकार हैं उनसे कुछ उम्मीद करना बेमानी होगा… आप अगर वाकई में शोध कर चुके हैं तो आपने शोधों से अवगत कराएँ…. आपके शोध भी आपकी तरह ही होंगे….. बोगस.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    आर. के. जी धन्यवाद आपके सहयोग के लिए…. कभी कभी इस मंच पर ऐसे लोग आ जाते हैं जो मंच की गंभीरता और लेखक के प्रयास को नहीं देखते अपितु कुछ भी उलुल्जलुल बकवास कर जाते हैं…. ये लोग ही इस देश और समाज की विकृति के कारक हैं…. और दुर्भाग्य से देश के महत्वपूर्ण महकमो यहाँ तक की प्रशासनिक विभागों में भी कार्य कर रहे हैं…. इनके लिए तो यही कहा जा सकता है…. हर डाल पे उल्लू बैठा है… अंजामे गुलिस्ता क्या होगा…

abodhbaalak के द्वारा
February 7, 2011

क्या बात है हिमांशु जी, आपने तो प्यार पर एक रीसर्च ……… ज्ञानवर्धक लेख पर बंधाई हो. कंटेस्ट के लिए मेरी शुभकामनाएं http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 9, 2011

    अबोध जी….. धन्यवाद…. आपको भी मेरी और से शुभकामनायें…..


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