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प्रेम : एक शाश्वत धारा

Posted On: 1 Feb, 2011 Others में

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सभी पाठकों को मेरा प्रेम भरा नमस्कार….. दोस्तों जैसा की आप सभी को विदित ही है की जागरण जंक्शन पर एक प्रेम प्रतियोगिता प्रारंभ हो चुकी है और सभी ब्लॉगर बंधू प्रेम विषय पर अपने अपने विचार प्रस्तुत कर रहे हैं…. इसी क्रम में मै भी अपनी यह पोस्ट आप सब के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ…. प्रेम निश्चय ही जीवन का सर्वप्रमुख विषय है….. इसके विषय में जितना लिखा या कहा जाये कम ही प्रतीत होगा…. फिर भी आप सबके मध्य इस विषय पर मै दिनांक १ से १४ फरवरी के मध्य अपने कुछ विचार कलम बद्ध करने का प्रयास करूँगा….. आप सबसे आग्रह करूँगा की मेरे इन विचारों के सम्बन्ध में आप सबकी जो भी राय हो उससे मुझे अवश्य अवगत कराएँ.


प्यार के अनेक किस्से और कहानियां हम सबने सुनी और पढ़ी हैं जैसे शीरीं-फरहाद, सोहनी-महिवाल, हीर-रांझा, रोमियो- जुलियेट आदि इनका कभी मिलन नहीं हुआ….. अगर गौर से देखें तो इतिहास में दुखद प्रेम के अफसाने ही नज़र आते हैं….. सुखद प्रेम के अफ्सानो की संख्या लगभग नगण्य ही होगी….. कम से कम मुझे तो अभी ऐसी कोई ऐतिहासिक कथा याद नहीं आ पा रही है…. अब प्रश्न उठता है की ऐसा क्यों है…. क्यों गृहस्थी प्रारंभ करते ही प्रेम हवा हो जाता है…. क्योंकि वह प्रेम कोरी कल्पनाओं पर आधारित होता है.


प्रेम मनुष्य की सबसे बड़ी जरुरत है…. इस जरुरत को पूर्ण करने का उपाय अक्सर मनुष्य के पास नहीं होता है….. इसका सबसे बड़ा कारण है मनुष्य का प्रेम की प्रकृति को न साझ पाना…. मनुष्य प्रेम के उपर अपनी अपेक्षाओं को खड़ा करता है…. और कर देता है प्रेम की हत्या. प्रेम की निश्छल तरंगो का दम घोंट देती है हमारी अपेक्षाएं…. क्योंकि अपेक्षा रहित प्रेम करने में अक्सर मनुष्य विफल हो जाता है.


ओशो ने कहा है कि ”प्रेम शाश्वत है लेकिन उसे स्थायी बनाने की कोशिश में तुम उसे मार डालते हो”….. शाश्वत का अर्थ है जो निरंतर हो….. जो निरंतर होगा वह स्थायी नहीं हो सकता क्योंकि स्थायी में निरन्तरता नहीं होती…. शाश्वत अर्थात नित नूतन नित नवीन…. प्रेम अस्थायी है……. प्रेम शाश्वत है…. वह रोज नए कलेवर में है….. उसे स्थायित्व में बंधने कि कोशिस मत करो…. नहीं तो वह मर जायेगा…. सड़ जायेगा.


प्रेम एक क्षण में इतना  गहन होता है कि आप उसमे डूब जाते हैं और अगले ही क्षण आपको लगता है कि यह कैसी अनुभूति थी….हमारी प्रेम कि यही गहनता कि कामना…..इसी गहनता के स्थायित्व कि इच्छा ….. प्रेम कि हत्या कर देती है…. और फिर हम यही गीत गाते मिलते हैं…

रास्ता वही, मुसाफिर वही, इक तारा न जाने कहां खो गया…..

प्रेम में मर जाने….एक दुसरे के लिए मिट जाने का जूनून पैदा होता है…. ये भाव झूटे नहीं होते लेकिन इन भावों का जीवन छोटा जरुर होता है…. कारण स्पष्ट है ये भाव भी तभी तक हैं जब तक प्रेम…. जब प्रेम ही नित नया…नित नवीन है तो ये मर मिटने के भाव तो क्षण भंगुर होंगे ही…. प्रेम की शाश्वतता के कारण ही ये भाव क्षण भंगुर हैं. प्रेम की राह में सबसे बड़ी बाधा है अहंकार….. घर परिवार, समाज ये कोई भी प्रेम की राह के बाधक नहीं है जैसा कि आम तौर पर कहा जाता है…. प्रेम की धारा अक्सर अहंकार के रेगिस्तान में लुप्त हो जाती है. अगर मनुष्य प्रेम में मरने की कला जान जाये तो प्रेम से उसका जीवन सदैव महकता रहेगा.


प्रेम में हार जीत मायने नहीं रखती है…. जो प्रेम में हारा है असल में उसी की जीत हुई…..यह तो मानव मन का स्वभाव है…. जिससे जितना प्रेम करता है उससे उतनी ही नफरत भी करता है…. मन के इस स्वाभाव को समझना बहुत जरुरी है…. अगर यह समझ में आ जाये तो दैनिक जीवन में हमें जो भी प्रेम में अडचने आती हैं वो समाप्त हो जाएँगी…. सबसे जरुरी बात यह है की पहले तो हम स्वयं को प्यार करें…. जब हम स्वयं को प्यार कर पाएंगे तभी हम दूसरे को प्यार कर पाएंगे…. लेकिन ध्यान रहे प्यार शर्तों से रहित होता है…. प्यार में कोई अपेक्षा नहीं होनी चाहिए ….. यदि प्यार अपेक्षाओं की सीढियों पर खड़ा होगा तो शाश्वत नहीं राह पायेगा. प्रेम को जीवन का अंग होना चाहिए. जिस प्रकार श्वाश लेने में हम नहीं सोचते हैं उसी प्रकार प्रेम की वर्षा करने में भी हमें विचार नहीं करना चाहिए…. यह भी उसी प्रकार निर्बाध होना चाहिए.


मत रोकिये प्रेम के प्राकृतिक प्रवाह को… निर्बाध रूप से बह जाने दे प्रेम की गंगा को… निश्चय ही महक उठेगा आपका जीवन.

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34 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Vipin C. Joshi के द्वारा
February 3, 2011

हिमांशुजी़  आपने प्रेम के वास्तविक स्वरूप का वर्णन किया है तथा साथ में आप भी ये बात मान रहे है के प्रेम मनुष्य की सबसे बड़ी जरुरत है…. प्यार त्याग है ….प्यार बलिदान है …..प्यार रस है …….प्यार तो प्यार है और कुछ नहीं ……..सीधी बात नो बकवास ….. एक अच्छे लेख पर आपको बधाई….तथा साथ में प्रतियोगिता हेतु शुभकामनायें ……

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 3, 2011

    विपिन जी, मंच पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद…..

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 3, 2011

श्री हिमांशु जी, आपके लिखे लेख को उन सभी लोगों को पढना चाहिए जो प्रेम के विपक्ष में रहते है…. बहुत ही सार्थक लेख… http://aakashtiwaary.jagranjunction.com आकाश तिवारी

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 3, 2011

    तिवारी जी धन्यवाद कोशिश कर रहा हूँ….. विचारों को शब्दों का रूप देने की…. यह सब आप लोगों के स्नेह और प्रोत्साहन से ही संभव है…..

Devendra Singh Bisht के द्वारा
February 3, 2011

बहुत अच्छा प्रेम की गंगा के बारे मैं लिखा

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 3, 2011

    देवेन्द्र भाई….. आपको लेख पसंद आया… यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है…. इसी प्रकार अपना स्नेह एवं आशीष बनाये रखियेगा और मार्गदर्शन करते रहिएगा….

nishamittal के द्वारा
February 3, 2011

हिमांशु ,प्रेम एक पवित्र भावना है.मेरे विचार से प्रेम तो किसे से भी किसी भी रूप में हो सकता है.प्रेम का स्वरूप बहुत व्यापक है परन्तु हम उसको संकुचित बना कर कुछ रिश्तों में कैद कर देते हैं.शुभकामनाएं.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 3, 2011

    धन्यवाद निशा जी…… निश्चित ही प्रेम तो असीम है….. उसे कैद नहीं किया जा सकता है….. अबाध बह जाने ही देना होगा प्रेम को….

Deepak Sahu के द्वारा
February 2, 2011

महोदय जी! प्रेम का सुंदर वर्णन किया अपने बधाई! http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/ दीपक

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 2, 2011

    दीपक जी….. आपका स्वागत है…..

abodhbaalak के द्वारा
February 2, 2011

हिमांशु जी आपके लेखन पर मई ऐसे ही न थोड़ी फ़िदा हूँ :) प्यार के रंगों को बड़ी ही सुन्दरता के साथ दर्शाया है…. ऐसे ही बिखेरते रहें इसं रंग को… http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 2, 2011

    अबोध जी….. नमस्कार….. आपने इतने तारीफों के पुल बांधे हैं की शुक्रिया कैसे अदा किया जाये…. यह समझ में नहीं आता है.

Manish Singh "गमेदिल" के द्वारा
February 2, 2011

निर्बाध रूप से बह जाने दे प्रेम की गंगा को… निश्चय ही महक उठेगा आपका जीवन…………. परन्तु सच्चाई के साथ जिया गया सच्चा प्रेम ही जीवन को संवार सकता है…………. मेरा दिल तो यही कहता है – प्रेम………………………………………………. एक कर्तव्य है ये रिश्तों का आधार है, यह एक मोती है, जिससे बनता जीवन का हार है…………………….. हिमांशु जी यदि आपके वयस्त जीवन शैली में समय हो तो कृपया एक द्रष्टि यहाँ भी डालें http://manishgumedil.jagranjunction.com/2010/09/02/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be/

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 2, 2011

    धन्यवाद मनीष जी, आपके इस प्रेम पूर्ण आमन्त्रण को अस्वीकार करने का कोई कारण हो ही नहीं सकता…..

Alka Gupta के द्वारा
February 2, 2011

हिमांशुजी , यही है प्रेम का वास्तविक स्वरूप …..प्रेम की उदात्त भावना ! अच्छा लेख !

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 2, 2011

    अलका जी, सादर प्रणाम, आपको लेख पसंद आया…. परिश्रम सार्थक प्रतीत हुआ.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 2, 2011

प्रिय हिमांशु जी, “जहाँ नहीं कोई ख़ुद से मतलब, जहाँ नहीं कोई ख़ाहिशें; जहाँ नहीं कुछ कहना पड़े, नहीं कोई गुज़ारिशें|” बहुत सुन्दर ढंग से व्याख्या की है आपने इस ‘पवित्र भावना’ की| धन्यवाद आपको, साभार,

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 2, 2011

    धन्यवाद वाहिद जी…… इस सुंदर प्रतिक्रिया के लिए…. आभार.

Bhagwan Babu के द्वारा
February 1, 2011

हिमांशू जी लगता है आप ओशो के समर्थक है क्योंकि आपके लिखने का जो अन्दाज है इससे साफ-साफ पता चलता है कि इस तरह की बात और भाषा का प्रयोग वही कर सकते है जो ओशो के समर्थक है। और आपने ओशो के विचार भी प्रकट किये है। ओशो महान है। उनके विचारो पर चलने वाला सिर्फ “प्रेम” को उपलब्ध हो सकता है और प्रेम सभी धर्मो का सार है । क्या बात है ….. अच्छा लगा …. पहली बार मुझको छोड्कर इस मंच पर ओशो के विचारो को रखा है आपने …. अच्छा लगा…

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 1, 2011

    धन्यवाद भगवन बाबू जी…… जी हाँ ओशो को मै रोज सुनता हूँ….. ओशो की बातें मुझे रोज एक नई तरंग नई उर्जा से सराबोर कर देती हैं….. ओशो ने मेरे जीवन का नजरिया बदल दिया है…..जीवन अब उत्साह और नव उर्जा से हरदम नविन दिखाई पड़ता है…. यही कारन है की मै ओशो का पुरजोर समर्थक हूँ…. आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

rajkamal के द्वारा
February 1, 2011

मत रोकिये प्रेम के प्राकृतिक प्रवाह को… निर्बाध रूप से बह जाने दे प्रेम की गंगा को… निश्चय ही महक उठेगा आपका जीवन…. प्रिय हिमांशु जी ..नमस्कार ! आपकी यह सलाह मान कर सुबह से कम से कम आधी दर्जन बार तो सेन्डिलो से पिट चूका हूँ ….. अब और बहने की ताकत नही बची है ….. ****************************************************************************************************************** इस प्रेम रस से सरोबार लेख पर मुबारकबाद

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 1, 2011

    नमस्कार राजकमल जी, धन्यवाद आपका एक बार पुनः अपनी बेबाक जिंदादिल टिपण्णी प्रस्तुत करने के लिए…..

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 2, 2011

    भ्राता श्री, मुझे पीट कर अपना बदला चुका लीजिए मगर इस तरह से हंसा-हंसा कर मारिये मत| इस अपमान के बदले में आपके लिए दुआ ही निकलती है…

Mala Srivastava के द्वारा
February 1, 2011

“”"यह तो मानव मन का स्वभाव है…. जिससे जितना प्रेम करता है उससे उतनी ही नफरत भी करता है”"……… सही कहा आपने ..

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 1, 2011

    धन्यवाद माला जी…..

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 1, 2011

आदरणीय भट्ट जी मतलब ये है की इन छुट्टियों का आप भरपूर इस्तेमाल करेंगे………… मैंने पहले ही राजकमल जी के ब्लॉग मे इस प्रतियोगिता का छुपा रुस्तम आपको घोषित कर रखा है……. ओर इस लेख के बाद लगता है की बहुत कुछ है आपके पास इस विषय मे लिखने के लिए…… ………….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 1, 2011

    पियूष जी आपने मुझे इस काबिल समझा इस हेतु मै आपका ह्रदय से शुक्रिया अदा करता हूँ….. कोशिश करूँगा इस विषय पर कुछ और सार्थक लिख पाऊँ…..

roshni के द्वारा
February 1, 2011

हिमांशु जी प्रेम पे बहुत अच्छा लेख लिखा अपने ………. मत रोकिये प्रेम के प्राकृतिक प्रवाह को… निर्बाध रूप से बह जाने दे प्रेम की गंगा को बहुत सुंदर

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 1, 2011

    उत्साहवर्धन के लिए आपका आभार…. रौशनी जी…. धन्यवाद.

priyasingh के द्वारा
February 1, 2011

गूढ़ भाषा में लिखा है आपने ये लेख शब्दों को गहराई से समझने के लिए मुझे दो बार पढ़ना पढ़ा ……… उत्तम प्रस्तुति ………. आपका ये लेख पढने के लिए तो दूसरा मौका मिल गया परन्तु जीवन दुसरा मौका कहाँ देती है जब तक हम प्रेम की गहराई समझ पाते है वो प्रेम हमसे दूर चला जाता है …..

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 1, 2011

    प्रतिक्रिया व्यक्त करने हेतु आपका आभार प्रिय जी…. इसी प्रकार सहयोग दीजियेगा…..

allrounder के द्वारा
February 1, 2011

हिमांशु जी, नमस्कार बहुत ही अच्छा और सटीक विश्लेषण किया है आपने प्रेम का ! सच कहा इंसान प्रेम मैं अपेक्षाएं बहुत ज्यादा रखता है एक – दूसरे से और जब ये अपेक्षाएं पूर्ण नहीं होती, तो प्रेम हवा होता नजर आता है ! एक अच्छे लेख पर बधाई, और प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाये !

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 1, 2011

    धन्यवाद….. आपको भी ढेरों शुभकामनायें…..


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