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कहाँ है शान्ति ?

Posted On: 8 Jan, 2011 Others में

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विश्व विजेता बनने कि मंशा से सिकंदर अबाध गति से बढ़ा चला जा रहा था…… एक बार राह में उसकी मुलाकात संत डायोजनीज से हुई …. संत ने प्रश्न किया…… सिकंदर…. अब क्या इरादा है तेरा ?…. क्या आकांक्षा रखता है तू ?….. सिकंदर बेबाक अंदाज में बोला….. पहले मै एशिया माइनर को जीतूंगा….. फिर हिन्दुस्तान को…. और उसके उपरांत सारे विश्व पर आधिपत्य हासिल करने हेतु आगे बढूँगा …. यह सुन कर डायोजनीज ने बड़ी भेदपूर्ण मुस्कान दी और फिर पूछा….. और उसके बाद ? विश्व का अधिकार पाने के बाद तू क्या करेगा ?….. सिकंदर ने कहा…. उसके बाद क्या ? उसके बाद तो मै शांति से रहूँगा….

डायोजनीज जोरदार अट्टाहास कर उठे…. उनके पास एक कुत्ता बैठा था… उसे सहलाते हुए वे बोले…. देख इस पागल सिकंदर को….. यह शांति पाने के लिए उपद्रव मचाने जा रहा है….. घोर अशांति फ़ैलाने की ठान चूका है…. भला अशांति देकर क्या कभी किसी को शांति मिली है ? और इधर मै सभी साम्राज्यों से बाहर , एक निर्जन वन में, इस मिटटी की धेली पर बैठ कर भी शांत हूँ… आनंद में हूँ.

प्रिय पाठकों अब आप ही बताइए क्या सिकंदर को शांति मिली? शांति हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं? क्या महत्वाकांक्षा शांति की विरोधी है? इस मुद्दे पर आप सभी के विचार आमंत्रित है…..

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sdvajpayee के द्वारा
January 11, 2011

हिमांशु जी,  शांति भी अपने में ही, अपने अंदर ही होती है।  रामायण तो कहती है-  निज अनुभव अब कहउं खगेसा, बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा। गीता में भगवान कहते हैं- अनन्‍याश्चिन्‍तयन्‍तो मां ये जना: पर्युपासते ,तेषां नित्‍याभियुक्‍तानां योगक्षेमं वहाम्‍यहम्। भलीभांति उपासना करने वालों को योगक्षेम भगवान स्‍वयं वहन करते हैं। ऐसे में शांति ही रहेगी। मुझे लगता है एक आधार जरूरी है। चाहे ज्ञान का हो या भक्ति का। इस आध्रार में टिके रह कर , इसके सहारे रह कर हम चाहे महात्‍वाकांक्षा करें , चाहे कोई काम-कामना करें , शांति ही रहेगी।

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 11, 2011

    बाजपेई जी , नमस्कार , सर्वप्रथम आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं…… आपका कथन सत्य है…. ज्ञान ही अन्धकार को दूर करता है….. जब ज्ञान का दिया जलता है तो समस्त विकार रुपी अँधेरा गायब हो जाता है…. बस अगर हम अपने इस जीवन में ज्ञान का दिया जलने में कामयाब हो जाये….. तो हर तरफ शांति ही शांति…. आपकी प्रतिक्रिया हेतु आभार.

Alka Gupta के द्वारा
January 10, 2011

हिमांशुजी, आज हर इंसान अपने अपने तरीके से निन्यानवें के फेर में या फिर किसी और फेर में पड़ा हुआ है हाँ आकाश जी के अनुसार अगर इंसान अपनी समस्त इच्छाओं व चिंताओं से निजात पा ले तो शायद शांति मिल सकती है…….पर प्रश्न चिह्न ? लगा हुआ है ….. .! परार्थ की भावना ….. मन पर नियंत्रण …….या फिर योगाभ्यास से………..!!!

    sdvajpayee के द्वारा
    January 11, 2011

     अल्‍का जी,  भारतीय दर्शन , जो मैं समझ सका हूं,  किसी चीज से निजात पाने या किसी को छोडने को नहीं कहता । यह नकारात्‍मक नहीं जीवन के प्रति सकारात्‍मक दृश्टिकोण रखता है। यहां केवल पकडना है। पकउना है जो श्रेयष्‍कर है। ज्ञान या भक्ति को। अंणेरा, नकरात्‍मक बातें तों स्‍वयमेव शिथिल -क्षीण हो जाती हैं।ं

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 11, 2011

    अलका जी, नमस्कार, मुझे ऐसा लगता है की अंततः आप उत्तर के निकट पहुचने में कामयाब हो ही गयीं हैं. प्रतिक्रिया व्यक्त करने हेतु आभार.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 11, 2011

    बाजपेई जी, आपके विचारों से मै पूर्णतया सहमत हूँ. धन्यवाद.

    Alka Gupta के द्वारा
    January 13, 2011

    श्री बाजपेयी जी , आपने मेरी बात को और भी अधिक स्पष्ट कर दिया है इसके लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूँ ! विषय बहुत ही रुचिकर है समय मिलने पर मैं भी थोड़ा बहुत लिखकर मंच पर प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगी……….! धन्यवाद !

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 15, 2011

    अलका जी इस विषय पर आपके लेख का मुझे भी इंतज़ार रहेगा…

Aakash Tiwaari के द्वारा
January 10, 2011

श्री हिमांशु जी, शान्ति वो भी आज के समय में,,एक स्वप्न की बात क्र रहे है आप इस ज़माने में जब इंसान भौतिक लालच में फंसा हुआ है तो शान्ति कैसे मिल सकती है… जिस इन्सान ने सभी इच्छाओं पर संतोष कर लिया हो उसे ही शांति मिल सकती है… आकाश तिवारी

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 11, 2011

    धन्यवाद तिवारी जी किन्तु एक प्रश्न है यदि संतोष हार मान कर कर लिया जाये जैसा की अक्सर होता है….. तो शांति कहाँ ….. यह संतोष तो मात्र हार को ढकने का आवरण है….. फिर तो प्रश्न यह उठ जायेगा की संतोष कैसे मिलेगा?

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 9, 2011

आपकी इस कहानी मे कुछ जोड़ना चाहता हूँ……… ओर वो ये है की सिकंदर ने कहा…. उसके बाद क्या ? उसके बाद तो मै शांति से रहूँगा… ओर फिर जब सिकंदर सब कुछ जीत चुका तो वापस अपने घर जाते हुए ………. रास्ते मे जब वो बहुत बीमार हो गया ओर उसके चिकित्सकों ने कहा की उसका बच पाना नामुमकिन है………. तो उसने चिकित्सक से कहा की वो अपना आधा साम्राज्य उस चिकित्सक को दे देगा………. बस वो उसको इतनी देर तक बचा ले की मरने से पहले वो अपनी माँ से मिल ले………… पर चिकित्सक ने कहा आधा क्या पूरा राज्य मिलने पर भी वो उसको नहीं बचा सकता है…………….. तो फिर कहाँ वो शांति से रहा………. अपितु वो तो शांति से मर भी नहीं पाया…………… दो किश्तें दी जा चुकी हैं………. एक फिर बाद मे…………..

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 10, 2011

    पियूष जी आपने बिलकुल ठीक कहा है….. शांति तो सिकंदर को नहीं मिली….. लेकिन प्रश्न तो यह है की आखिर शांति मिलेगी कैसे…..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 10, 2011

    जब आप निस्वार्थ भाव से कर्म करना प्रारम्भ कर दें………. एक महान दार्शनिक नाम याद नहीं शायद लाओत्से ही थे …….. ने कहा था की कोई मेरा अपमान नहीं कर सकता । क्योकि मैं किसी से सम्मान की अपेक्षा ही नहीं रखता……. कोई मुझे दुख नहीं दे सकता क्योकि सुख के बारे मे मैं सोचता ही नहीं………. जब इस तरह की सोच विकसित हो जाए तो अशांति आपके जीवन मे रहेगी ही नहीं ……… क्योकि आप शांति की आशा ही नहीं कर रहे होंगे…………. जब किसी वस्तु की मांग समाप्त हो जाए तो फिर उसका मूल्य भी खत्म हो जाता है………..

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 11, 2011

    PIYUSH JI…. WELL SAID…. THANKS FOR EXPLAINING YOUR VIEWS…..

nishamittal के द्वारा
January 9, 2011

बहुत अच्छी शिक्षा हिमांशु जी,काश आज की साम्राज्यवादी शक्तियां ये समझती और समझते हमारे नेता गन.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 10, 2011

    धन्यवाद निशाजी, लोग शांति के लिए बन्दूक उठाने की बात कैसे करते हैं….. यह समझ से परे है.

abodhbaalak के द्वारा
January 9, 2011

thoda aur, thoda aur ………………….. इस और का अंत कहाँ हैं bhai? jo hai agar manushy us par hi santushti kar le to ……….. sundar rachna .ke liye bandhaai sweekar karen himanshu ji http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 10, 2011

    धन्यवाद अबोध जी लेकिन प्रश्न तो निरुतरित रह गया है.

naturecure के द्वारा
January 9, 2011

हिमांशु जी, सुप्रभातम ! मनुष्य की इच्छाएं तो अनंत हैं | शांति किसी विषय वस्तु अथवा भोग का नहीं बल्कि मन का विषय है | डॉ. कैलाश द्विवेदी

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 10, 2011

    उचित ही कहा है आपने…… लेकिन द्विवेदी जी मन को शांत करने का उपाय क्या?

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 9, 2011

हिमांशु जी…….. थोड़ा फोंट्स का आकार अधिक बड़ा हो गया है…….. महत्वाकांक्षा शांति की विरोधी नहीं है ……… लेकिन अंधी दौड़ शांति को खत्म कर देती है…………. महत्वाकांक्षा केवल इतने भर की हो की जिसको पाकर आप उसका पूरी तरह उपभोग कर सके तो ठीक …… अन्यथा महत्वाकांक्षी सिकंदर की तरह ही पा तो सब लेते है पर ठीक भोग के समय दुनिया से चले जाते हैं………. ओर इस दौड़ मे वो अपने अमूल्य जीवन को यूं ही समाप्त कर लेते हैं……… अच्छी कहानी ओर अच्छे प्रश्नो से भरे इस लेख के लिए बधाई……..

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 10, 2011

    पियूष जी महत्वाकांक्षा और अंधी दौड़ में अंतर क्या है? अगर स्पष्ट कर पायें तो कृपा होगी….. आपके सहयोग के लिए धन्यवाद

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 10, 2011

    आदरणीय हिमांशु जी……… महत्वाकांशा किसी वस्तु के भोग की इच्छा है………. भोग किया ओर समझ लिया की ये व्यर्थ है………… किन्तु किसी वस्तु को पा लिए ओर बिना भोगे फिर उसको ओर बढ़ाने लगे तो ये अंधी दौड़ है………… धन कमाया ओर उसको भोगा…….. फिर समझे की धन सुख नही दे पा रहा है………… जो सुख एक लाख मे नहीं है वो एक करोड़ मे भी नहीं होगा……….. ये समझ कर इस दौड़ से हटना ही जीवन को जीना है………. यही सिकंदर के  साथ हुआ………. वो जमा करता गया पर भोग नहीं पाया………

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 11, 2011

    पियूष जी, नमस्कार…. आपकी लेखन शैली के तो हम कायल ही थे आज गहराई के भी दर्शन हो गए….. सुंदर व्याख्या.

rajkamal के द्वारा
January 8, 2011

प्रिय हिमांशु जी ..नमस्कार ! सिकंदर कों शांति मिली चाहे नही मिली … लेकिन रहती दुनिया तक उसके जनाजे से बाहर निकाले हुए खाली हाथ पूरी दुनिया कों मार्गदर्शन देते रहेंगे ….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 10, 2011

    rajkamal ji thank you……. उम्मीद करता हूँ आपका उधार मुझ पर शेष नहीं है……


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