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सबसे बड़ा दंड.... पश्चाताप.

Posted On: 24 Nov, 2010 Others में

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एक बार एक राजा कैदियों से मिलने कारागार में पहुंचा. सब कैदी दौड़ कर राजा के चरणों में जा गिरे और प्रार्थना करने लगे…… हे राजन, हम निर्दोष हैं…. हमने चोरी नहीं की…… हमने डकैती नहीं डाली…… न ही हमने किसी का क़त्ल किया है…. आपके सैनिक हमें भूलवश चोर डाकू समझ बैठे हैं. हम पर कृपा कर हमें आज़ाद कर दें. राजा उन सबकी गुहार को अनसुना कर कारागार के एक कोने की ओर जाने लगा. वहां एक कैदी चुपचाप सर झुकाए बैठा था. राजा को समक्ष पाकर वह बोला….. राजन आपकी अदालत ने मुझे जो सजा दी है …. मेरे गुनाहों के आगे वह बहुत कम है…… पता नहीं परमात्मा की अदालत मुझे क्या सजा देगी…… इतना कह कर वह फूट फूट कर रोने लगा. राजा ने अपने सैनिकों को आदेश दिया ….. कि इस व्यक्ति को तुरंत रिहा कर दिया जाये.


कथा का भाव…… जो व्यक्ति पश्चाताप कि अग्नि में जल कर स्वयं को दण्डित कर लेता है, उसे बाहरी दंड देने कि आवश्यकता नहीं रहती. पर जिन्हें अपने गुनाहों पर पछतावा नहीं है, वे कभी नहीं सुधर सकते, अतः वे क्षमा के भी अधिकारी नहीं हैं.

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajkamal के द्वारा
November 24, 2010

नीतिगत बाते हमेशा ही अच्छी लगती है प्रेरणादायक जैसी

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    November 25, 2010

    धन्यवाद, राजकमल जी……. सहयोग बनाये रखें……

nishamittal के द्वारा
November 24, 2010

.सही कथन है आपका पश्चाताप के दो अश्रु ऊपर वाले की अदालत में शायद क्षमा कर देते होंगे.अच्छी लघु कथा.

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    November 25, 2010

    धन्यवाद निशा जी……. यदि सजा देने का उदेश्श्य पूर्ण हो जाये तो सजा की आवश्यकता नहीं रह जाती है…..

alkargupta1 के द्वारा
November 24, 2010

एक अच्छा संदेश देती हुई श्रेष्ठ रचना है।पश्चाताप करने के बाद सभी गुनाह क्षम्य हैं…….  

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    November 24, 2010

    धन्यवाद अलका जी, आपने बिलकुल ठीक कहा……….

Aakash Tiwaari के द्वारा
November 21, 2010

हिमांशु जी, शिक्षाप्रद लेख के लिए धन्यवाद…… आकाश तिवारी

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    November 23, 2010

    तिवारी जी. सहयोग के लिए ….. बहुत …. आभार.

abodhbaalak के द्वारा
November 20, 2010

हरीश जी, गागर में सागर कह सकते हैं इस रचना को. वास्तव में पछतावे से पाप खुद ही धुल जाते हैं, बहुत ही सुन्दर रचना, बंधाई हो , http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    November 23, 2010

    अबोध जी, आप इस लघु कथा का मर्म समझ पाए……. तो मेरा प्रयास सफल रहा….. प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद .

chaatak के द्वारा
November 20, 2010

स्नेही भट्ट जी, आपके द्वारा प्रस्तुत इस लघु कथा को मैंने भी कई बार पढ़ा है और जो भाव आपने बताये वाही इस कथा का वास्तविक भाव भी है| एक अच्छे विचार को मंच पर रखने के लिए आप बधाई के पात्र हैं!

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    November 20, 2010

    जी हाँ चातकजी , आपने यह कहानी अवश्य पढ़ी होगी, कहानी मुझे शिक्षाप्रद प्रतीत हुई, और कथा का भाव ऐसा था की उसे इस मंच पर लाना एक उचित पहल प्रतीत होने के कारन मैंने इसे पोस्ट किया……

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 19, 2010

खूबसूरत विचार………….. सुन्दर कहानी…….. बधाई…..

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    November 20, 2010

    धन्यवाद, पियूष भाई…..

ashvinikumar के द्वारा
November 19, 2010

आप्त वचन ,आपने सब कुछ कह दिया है अतः कहने के लिए कुछ शेष नही है ……..जय भारत

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    November 20, 2010

    अश्विनी कुमार जी… प्रतिक्रिया हेतु आभार…….


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