Solutions for Life (जीवन संजीवनी)

जीवन के प्रति समर्पित ब्लॉग

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HIMANSHU BHATT


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म्यूचुअल फंडों में कैसे करें निवेश?

Posted On: 26 Feb, 2011  
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Others बिज़नेस कोच में

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जागरण जंक्शन के मंच पर साहित्य को मरने मत दो -एक अनुरोध

Posted On: 16 Feb, 2011  
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जागरण जंक्शन के मंच पर प्रेम की बकवास

Posted On: 11 Feb, 2011  
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Others मस्ती मालगाड़ी में

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रूपकुंड: एक रहस्य

Posted On: 10 Feb, 2011  
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वैलेंटाइन डे : जायज़ विरोध

Posted On: 9 Feb, 2011  
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स्वयं से करें प्रेम

Posted On: 8 Feb, 2011  
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प्यार का केमिकल लोचा

Posted On: 7 Feb, 2011  
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प्यार करके तबाह हो जाना

Posted On: 2 Feb, 2011  
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प्रेम : एक शाश्वत धारा

Posted On: 1 Feb, 2011  
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कहाँ है शान्ति ?

Posted On: 8 Jan, 2011  
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एक नई सुबह : मंगलमय नव वर्ष

Posted On: 1 Jan, 2011  
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Others मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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कलयुग : सब युगों में सर्वश्रेष्ठ

Posted On: 21 Dec, 2010  
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आपका व्यवहार है आपकी पहचान

Posted On: 17 Dec, 2010  
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कार्य में सफल होने के तरीके

Posted On: 15 Dec, 2010  
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साहस : सही निर्णय लेने में सहायक

Posted On: 28 Nov, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

सर आपका लेख पढ़ कर अच्छा लगा पर आज के टाइम में लोग प्यार को वासना तक ही सिमित रखे हुए है क्योकि मै एक लड़की को बचपन से ही प्यार करता था पर कभी मैंने उशे बताया नही लेकिन ५-६ सालो के बाद उसने मुझे बोला कि वो मुझे पसंद करती है और प्यार भी.. मै बहुत खुस था हम दोनों कि दोस्ती पुरे एक साल तक चली, मैंने कभी भी उसके साथ सेक्स या कुछ भी गलत करने का ख्याल तक मेरे मन में नही आया और अंत में उशने मुझसे दुरी बना ली और किसी और को अपना दोस्त बना लिया...मुझे मेरे दोस्तों ने बताया कि आज के टाइम में प्यार नही आकर्षण होता है उसकी इश्चाए पूरी नही हुई इसलिए उसने तुझे छोड़ दिया..मुझे ज्यादा तकलीफ ईश बात से होती है कि लोग झूठ बोलकर अपने प्रेम के जाल में फसाते है और मतलब निकले तो भी और ना निकले तब भी अंत में छोड़ देते है...मुझे आज भी उसकी यादे परेसान करती है और हर दिन मुझे ऐसा महसूस होता है कि ये कल कि ही बात हो......

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हिमांशुजी, तारीफ की बात नहीं है बल्कि यकीं मानियेगा इतना विचारोत्तेजक लेख मैंने इस मंच पर पहली बार पढ़ा .मेरा मतलब ये नहीं कि ऐसे लेख और नहीं होंगें पर सब के सब तो नहीं पढ़ सकता. साहित्य के बारे में आपके विचारों से सहमत होते हुए भी एक बात कहना चाहूँगा कि साहित्य का काम समाज को जगाना या सुधारना आदि नहीं है .अधिकांस साहित्यकार लिखते समय इस उद्देश्य को ले कर नहीं चलते बल्कि उनकी रचनाधर्मिता स्वान्तः सुखाय होती है और इस प्रक्रिया में अक्सर समाज के लिए भी कुछ अच्छा हो जाता है पर उसे "बाई प्राडक्ट" मानिए. बहरहाल चिंतन और सर्जनात्मकता कि बात से मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ. आपने मुन्स्शी प्रेमचंद का जो उद्धरण कोट किया वो वास्तव में अद्वितीय है. चिंतन शक्ति के हराश कि बात बिलकुल सही है. यह बड़ा खतरा है. साहित्य कि बात छोडिये, यहाँ तक कि राजनीती में भी आयीडियोलोग नहीं रहे कोई सो चिंतन का सर्वथा आभाव है जिसका परिणाम निरंकुश, बेलगाम व सिद्धान्तहीन राजनीती में हुआ. ब्लागलेखन के बारे में आपके विचारों से मैं सहमत हूँ क्यों कि किसी के 33 ब्लॉग पर जब 1250 प्रतिक्रियाएं देखि तो ताज्जुब हुआ फिर ये सोच कर उन्हें पढने बैठा कि वाकई कुछ कमाल कि बात मिलेगी जो इतने लोगों ने कमेन्ट किया है परन्तु घोर निराशा हुई क्योंकि मेरी अपनी व्यक्तिगत राय में मसल बिलकुल मिडियोकर था. ब्लाग technology कि देन है और यह भासा को कुछ नए शब्द और ईडियम भी दे रहा है. इस से भासा समृद्ध होती है. जयपुर के विश्व साहित्य सम्मलेन में हुई एक परिचर्चा में हिंदी में ब्लॉगों द्वारा जो कुछ नए डेवलपमेंट हो रहें हैं उस पर काफी दिलचस्प वर्तालाप हुआ. इस में मैंने भी भाग लिया और विद्वज्जनों के विचारों से मुझे इस बारे में ज्ञान प्राप्त हुआ था. आपके विचार सुन्दर हैं परन्तु पाजिटिव नहीं ऐसा मुझे लगा क्योंकि मेरी अपनी राय में साहित्य और साहित्यकार अक्सर घोर निरस्य के अंधेरों को चीर कर सूरज कि तरह प्रकाशपुंज बन कर udit होते हैं

के द्वारा:

हिमांशु जी , नमस्कार l बहुत सुन्दर भाव से विश्लेषित आपका लेख विलम्ब से सही आज पढ़कर अच्छा लगा l ऐसी अनेक बाते जो मुझे अच्छी नहीं लगती उसे आपने सहजता से व्यक्त किया आपने ,शुक्रिया l साहित्य के बारे में आपने बहुत अच्छी बाते कही हैं ,साहित्य समाज का दर्पण होता हैं और लेखको की जिम्मेदारी भी समाज के प्रति l जब मैंने jj मंच पर ब्लॉग लिखना शुरू किया तो सोचा भी न था यहाँ भी राजनीती या गुटबाजी होगी l मैं तो शांतिप्रिय हूँ ,खुश रहना तथा ख़ुशी देना मुझे अच्छा लगता हैं l मुझे लिखना अच्छा लगता हैं लिखती हूँ मगर मैं जानती हूँ मेरी भाषा पर उतनी जानकारी नहीं हैं जो कि एक लेखक या लेखिका के लिए जरुरी होता हैं l ऐसे में वरिष्टजनों के प्रतिक्रिया चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक दोनों ही क्षेत्र में मेरे लिए महत्वपूर्ण होता जिससे मुझे कुछ न कुछ सिखने को अवश्य ही मिलता हैं l बहरहाल ,एक अच्छे लेख प्रस्तुत करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार l

के द्वारा:

आदरणीय खुराना साहब, सादर प्रणाम! शायद संजीव जी की प्रतिक्रिया के नीचे मैं अपने अभिप्राय को स्पष्ट नहीं कर पाया था, जो यहां फ़िर से करना चाहूंगा । टिप्पणियों की संख्या को तरज़ीह प्राप्त होने से मेरा मतलब किसी प्रतियोगिता से नहीं, बल्कि 'ज़्यादा चर्चित' कालम में स्थान प्राप्त करने से है, और यह भी प्रकारांतर से एक सम्मान की श्रेणी में आता है जिसे रोज़ देखा ही नहीं जाता है, बल्कि उसपर क्लिक कर सीधे तौर पर अधिकाधिक संख्या में लेख पर पाठकों की पहुंच का मार्ग भी प्रशस्त होता है । ज़ाहिर है यह कालम हर लेखक के आकर्षण का केंद्रबिन्दु है, और हर किसी का इसमें स्थान प्राप्त करने के लिये प्रयत्नशील होना लाज़मी है । प्रतियोगिता में पुरस्कृत होने के लिये अर्हता मिले न मिले, परन्तु सप्ताह का ब्लागर बनवाने में तो ये कालम सीधे-सीधे योगदान करते ही हैं । इससे कौन इंकार करेगा ? टिपाणियों से जुड़े कदाचार की गंगा यहीं से निकलती है, जो आरम्भ में निर्मल और पावन होते हुए भी अंत में अपनी पहचान खोकर कचरे के नाले का स्वरूप ले लेती है । प्रत्यक्षं किं प्रमाणम ? आप अभी इसी वक़्त वहां पहुंचिये और ज़्यादा चर्चित में सबसे ऊपर से तीन चार रचनाओं को खोलकर उनकी सारी टिप्पणियां पढ़ जाइये, आपकी तवीयत हरी हो जाएगी । ऐसा पहली बार भी नहीं हो रहा, हममें से ढेर सारे इस खेल के रिटायर्ड लोग हैं । जहां तक प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत होने की बात है, यह जागरण जंक्शन प्रबंधन के विशेषाधिकार का मामला है कि वह किसको किस आधार पर चुनता है । इस पर कोई बहस की ही नहीं जा सकती । उन्होंने कुछ सीखने के लिये एक बड़ा प्लेटफ़ार्म मुहैया करा दिया है, यह भी कोई कम बड़ा पुरस्कार नहीं है । अब चूंकि मंच पर स्तरीय लेखकों की अच्छी संख्या हो चुकी है, लिहाज़ा प्रबंधन को चाहिये कि प्रोत्साहन की नीतियों में संशोधन और परिमार्जन करे, ताकि सभी लोग बच्चा क्लास वाली अपनी तंग पड़ती निकर से मुक्त होकर कुछ वयस्कपरक हाथ दिखा सकें । हिमांशु जी से अनुरोध है कि इस आलेख की सभी टिप्पणियों का जवाब लिखकर उनकी संख्या में यथाशीघ्र यथोचित वृद्धि करने का कष्ट करें, ताकि आलेख चर्चित कालम में शामिल होकर बहस को जारी रख पाए । अन्यथा उनके इस सद्प्रयास को भी गुमनामी के गर्त में समाते देर नहीं लगेगी । साधुवाद ।

के द्वारा:

संजीव जी.... नमस्कार.... आपने लेख को सराहा इस हेतु आपका आभार... आपका कहना और आपकी चिंताएं जायज हैं लेकिन गुटबंदी की और इतना अधिक ध्यान देने की जरुरत नहीं है क्योंकि ऐसा अक्सर होता है की किसी के विचार आपको प्रभावित करते हैं तो आप उनके लेख रोज पढ़ते हैं... मई भी राजकमल जी, पियूष जी, निशा जी, चातक जी, दिवेदी जी, आकाश जी, वाहिद भाई, खुराना जी, शाही जी, रमेश बाजपेयी जी, सचिन जी, रोशनीजी, अलका जी, अमित जी दुबे जी, पाण्डेय जी और भी अन्य लेखकों के लेख ढून्ढ कर पढता हूँ लेकिन जहाँ पर असहमत होता हूँ वहां पर असहमति दर्शाता हूँ...इस तरह के गुट बनना स्वाभाविक है... यह एक आत्मीयता को दर्शाता है... यहाँ पर हम एक दुसरे से आत्मिक रूप से जुड़ते हैं, एक पारिवारिक सम्बन्ध बनता है... और अच्छा लगता है... रौशनी जी... चातक जी... निशा जी... सचिन जी... और पियूष जी से मैंने फेस बुक पर चैटिंग की है और इतना सुखद अहसास हुआ की जैसे बिछड़े हुए मित्र मिल रहे हों... निशा जी ने मुझसे मेरे काम के बारे में पुचा... मेरे बच्चे की फोटो देखकर उसकी तारीफ़ की... रौशनी जी ने भी इसी तरह काफी देर बात की... बहुत अच्छा और आत्मीयता का अनुभव रहा... अगर ऐसे रिश्ते इस मंच के माध्यम से उभर के आते हैं तो इसे गुटबाजी कहना गलत है... मई तो लेखन की बात कर रहा हूँ... लेखन में अगर मेरी त्रुटी है तो सभी मित्रों को उस और ध्यान दिलाना होगा जिससे मई उसमे सुधार कर सकूँ... यह मेरा कहना है... और कुछ नहीं...

के द्वारा: HIMANSHU BHATT HIMANSHU BHATT

चातक जी....पोस्ट की सराहना करने के लिए आपका आभार... यह बात सही है की विचार प्रकट करने का अधिकार सभी को है.... लेकिन अधिकार के साथ कुछ कर्तव्य और जिम्मेदारियां भी जुड़ जाती हैं... कुछ भी सार्वजानिक रूप से कह देना उचित नहीं होता... हमारी कुछ मर्यादाएं और सीमाएं हैं... जिनके दायरे में रह कर हमें लेखन करना है... मै आपकी इस बात से थोडा असहमत हूँ की सब जिम्मेदारियां साहित्यकारों की हैं... अगर ऐसा है तो इस जिम्मेदारी की अवहेलना करने वालों को लेखन से दूर रहना चाहिए... क्योंकि मेरा मानना है की किसी भी प्रकार का लेखन साहित्य की श्रेणी में ही आता है... चाहे उसकी कोटि अलग अलग हो... आप ब्लॉग लिख रहे हैं... यह भी साहित्य की एक नयी विधा है... ब्लॉग लेखन में भी आप साहित्य के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते.... आप जैसे मंच के प्रथिष्ठित लेखकों से सैदेव मार्ग दर्शन का आकांक्षी रहूँगा... धन्यवाद.

के द्वारा: HIMANSHU BHATT HIMANSHU BHATT

प्रिय हिमांशु जी, आपका लेख पढ़ कर प्रसन्नता हुई की आपने एक सही बात को उठाया है ! परन्तु शायद आप इस मंच से नये जुड़े है आपने सभी ब्लागर्स को नहीं देखा ! जैसे की शाही जी ने कहा नवोदित लेखको ने इस मंच से बहुत कुछ पाया और सीखा है ! जहा तक प्रतिक्रीयायों का सवाल है तो मैं यह कहना चाहता हूँ की प्रतिक्रिया मिलने से जहां उत्साह मिलता है वही अपनी कमियों का भी पता चलता है ! राजकमल जी ने एक बार लिखा था की जब उनकी पोस्ट फीचर्ड होती थी तो ख़ुशी के मारे उनके आंसू निकल आते थे ! आप इस भावना को समझ सकते है ! हाँ यहाँ मैं शाही जी की इस बात से सहमत नहीं की जागरण टीम केवल प्रतिक्रिया की संख्या पर पुरस्कार देती है ! यह मेरा स्वंय का अनुभव है की जागरण टीम ने लेख को महत्त्व दिया है ! न की लेखो या प्रतिक्रिया की गिनती को ! इस मंच पर ऐसे ऐसे लेखक भी थे जिन्होंने बहुत लेख आदि लिखेऔर कुछ लेखको को 200 तक प्रतिक्रियाये मिली लेकिन उनका नाम टाप 20 में भी नहीं आया ! लेकिन जागरण ने अच्छे लेखो को अधिमान भी दिया और प्रुस्कृत भी किया ! मैं इस बात के लिए जागरण टीम का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ ! इधर कुछ लोग आपस में गाली गलौच तक करने लग गए है जो की बहुत ही शर्मनाक बात है ! लेखक तो समाज को शिक्षा देने वाला और समाज को आईना दिखाने वाला होता है ! यदि हम ही आपस में गलियां देने लग जायेंगे तो हम समाज को क्या सन्देश देंगे ! इस मंच पर लेखक और लेखिकाएं दोनों अपने विचार रखते है अगर हम मर्यादा का पालन नहीं करेंगे तो आपके बारे में लोग क्या सोचेंगे ! मुझे आशा है की मेरी बात के भाव को समझ कर मर्यादा का पालन करते हुए लेख लिखे जायेंगे ! धन्यवाद आर के खुराना

के द्वारा: R K KHURANA R K KHURANA

संजीव शर्मा जी, आपने ब्लाग जगत की दुखती रग पर हाथ रखते हुए अपनी टिप्पणी दी है । एक तरफ़ जहां लेखकों की हौसला अफ़ज़ाई और स्वस्थ बहस के लिये ब्लाग्स पर टिप्पणियों की अनिवार्यता से इंकार नहीं किया जा सकता, वहीं दूसरी तरफ़ ये टिप्पणियां ही सारे फ़साद की जड़ भी होती हैं । खास कर ऐसी व्यवस्था में जहां सफ़ल या असफ़ल ब्लागर का दर्ज़ा बनाने का मापदंड ब्लाग पर आने वाली टिप्पणियों की संख्या को आधार बनाकर किया जाता हो । मात्र इस वजह से ही लेखक और टिप्पणीकार दोनों को ही अपने ज़मीर से अलग हटकर समझौते करने पड़ते हैं । लेखक कब गुटबंदी का शिकार होकर किस खेमे या धड़े के साथ जुड़ चुका है, इसका पता भी बहुत सारे लेखकों को तब चल पाता है, जब वे इस दलदल में आकंठ उतर चुके होते हैं । टिप्पणियां सबको चाहिये, चाहे वो किसी भी कैटेगरी के लिखने वाले क्यों न हों । एक नया फ़ैशन चल पड़ा है टिप्पणी के नीचे अपना लिंक देने का । हंसी भी आती है, जब अच्छा लिखने वाले भी टिप्पणी के अंत में बड़े दयनीय भाव से अनुरोध करते पाए जाते हैं कि कृपया मेरी दुकान पर भी पधारिये न महोदय ! अब आप इसे क्या कहेंगे ? मैं आपको भी बहुत दिनों से जानता हूं । आप काफ़ी अच्छा लिखते हैं, लेकिन आपको टिप्पणियां नहीं मिलतीं । क्योंकि जब आप किसी को भाव नहीं देते तो कोई फ़्री में आपको कबतक भाव देगा ? कुछ ऐसा ही चलन बन चुका है । आप यदि कुछ दिनों के लिये बीमार पड़ जायं या कहीं बाहर चले जायं तो आपका खेमा दरकने लगता है, सेंधमारी होने लगती है । लौटकर अपने वोट बैंक को दुरुस्त करना पड़ता है । यह सब है तो मज़ेदार, लेकिन अब सूरत बदलनी चाहिये । कैसे बदलेगी, सबको मिलकर सोचना होगा । मात्र एडीटोरियल विभाग में ही एकाध ऐसे विद्वान लेखक हैं, जिन्हें गुटनिरपेक्षता के बावज़ूद थोक के भाव में वोट मिलते हैं । ज़ाहिर है कि सभी रातोंरात उस स्तर के लेखक तो बन नहीं पाएंगे ।

के द्वारा:

आदरणीय हिमांशु जी प्रणाम ! बहुत ही ज्ञानवर्धक सन्देश दिया आपने ......अमल करने योग्य ....... मैं पूर्ण रूप से सहमत हूँ आपके इन विचारों से ........आपने मेरे मन की बात कह दी इसके लिए आभार !!!!! गुस्ताखी कर रहां हूँ .....लेकिन .....यहाँ साहित्य के साथ मजाक किया जा रहा है और इस कुकृत्य में मैं भी शामिल हूँ ...... मुझे लग रहां है की अब हम JJ के माध्यम से एक जिम्मेदार लेखक हो गए है जिसका समाज पर सीधा प्रभाव पड़ेगा ....बेशक हम अपने विचारों को लिखते हैं | लेकिन हमें समीक्षा करने चाहिए की इन विचारों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा | क्या ये जन हित में है , क्या लोग इससे लाभान्वित होंगे और होंगे तो उनका लाभ नैतिक होगा ? हमारे द्वारा लिखे हुए लेख को हजारों लाखो लोग पढ़ते होंगे | लेकिन हमें इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए की हमारे द्वारा लिखा हुआ महत्वपूर्ण लेख क्या सन्देश दे रहा है | JJ के कार्यकर्त्ता गण को इस मामले में दखल जरुर देना चाहिए !!!!! और शायद कुछ लोगों को फीचर्ड होने की ज्यादा ललक है इस लिए आपके द्वारा कही हुई बातें उन्हें राश नहीं आएँगी | मैं आपका आभारी हूँ .....बहुत सुन्दर विचार आपने व्यक्त किया ........ मैं आपका पूर्ण रूप से समर्थन करता हूँ ..... अमित देहाती

के द्वारा: Amit Dehati Amit Dehati

हिमांशु जी, आपकी अपील पर मिली इन ढेरों सकारात्मक प्रतिक्रियाओं से एक बात तो पूरी तरह स्पष्ट हो गई है कि अच्छे लेखन के कद्रदानों की कमी नहीं है.मैं भी आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि निशुल्क मिली इस लेखन सुविधा/मंच का इस्तेमाल सार्थक और प्रेरक लेखन के लिए होना चाहिए न कि समय और जगह की बर्बादी के लिए. वैसे कहीं-कहीं लगती टिप्पणियों की मंडी से कही न कही गुट में बंटते ब्लागरों की भनक लगती है और हमारे कई साथी पिछले दिनों हुए एक बैठक में इस पर चिंता जाहिर कर चुके हैं.आपके माध्यम से मैं भी अपील करना चाहता हूँ कि अच्छे लेखन की सराहना कीजिये पर हर-कुछ को भी इतना मत सराहिये कि अच्छे लेखक भी मायूस होकर हर-कुछ लिखने लगे..बहरहाल एक क्रांतिकारी पोस्ट के लिए बधाई

के द्वारा: sanjeev sharma sanjeev sharma

 हिमांशु जी , आपकी साहित्‍यानुरागी  वृत्ति को सम्‍मान देते हुए किंचित असहमति के साथ निवेदन करना चाहता हूं कि लेखन और साहित्‍य अनिवार्यत: एक नहीं होते। कभी कभी उम्‍दा लेखन भी साहित्‍य के दायरे से बाहर होता है। निजी तौर पर मेरा मानना है कि ब्‍लागिंग साहित्यिक मंच नहीं भाव-विचारों की सहज अभिब्‍यक्ति का माध्‍यम है। इसमें हर तरह के लोग - टाइम पास करने वाले , हास्‍य व मनोरंजन करने वाले , जानकारियां व ज्ञान बढाने वाले, साहित्‍य पिपासा शांत करने वाले - सहभागी होते हैं। दर्शन-चिंतन, अंर्तदृष्टि, संवेदना और भाव प्रवणता के ताप की उच्‍चता ही किसी लेखन को साहित्‍य की सम्‍मानित परिधि में पहुचाती है। साहित्‍य मन,प्राणों का सत्‍व होता है। वह जितना लोक हितार्थ होता है उससे कहीं अधिक स्‍वांत: सुखाय होता है। वह केवल आइना ही नहीं दिखाता ,आगे की सही राह भी बताता है। वह ऋषियों की तरह सत्‍याग्रही और सर्व दृष्‍टा होता है। तभी दिनकर से अधिक उसकी गति होती है। ब्‍लागिंग में साहित्‍येतर लेखन-प्रविष्टियों से साहित्‍य नहीं मर सकता। वह उनमें से भी अपने लिए आवश्‍यक ऊष्‍मा-पोषण निकाल लेगा। साहित्‍य के लिए कभी निरापद मैदान नहीं मिलता। वह कंकरीले-पथरीले मार्गों से ही अपनी यात्रा जारी रखता है।  इस लिए अनुरागियों के लिए साहित्‍य-सुरभि बिखेरते रहें।

के द्वारा:

हिमांशू जी यही तथ्य भाई राघवीर चौहान जी ने भी रखे थे,लेकिन मंच पर जूं तक नही रेंगी ,हालांकि वह केवल ब्लागिंग ही नही समूचे साहित्य जगत को वार्ता के मंच पर ले आये थे ,शायद आज कल साहित्य की परिभाषा परिवर्तित हो गयी है मे मानता हूँ की यह सामाजिक मंच है सभी अपने विचारों को उन्मुक्त ढ़ंग से रख सकते हैं लेकिन एस उन्मुक्तता की भी कोइ ल्क्छ्मन रेखा निर्धारित होनी चाहिए अन्यथा यह उन्मुक्तता ब्लागिंग की दुनिया जो अभी शैशवा अवस्था में ही है प्रोढ़ होने से पहले ही इतनी विकृत न हो जाए कि इसमे से सड़ांध फूटने लगे,ब्लागिंग की दुनिया साहित्य का ही एक अंग है सुसभ्य साहित्य का ,,आपने अपने लेख में ही इतना कुछ लिख दिया है कि कुछ लिखने के लिए बाकी ही नही बचा है ......जय भारत

के द्वारा:

हिमांशु जी, समस्या को आपने मौलिक रूप में अभिव्यक्ति दी है । साहित्य की उत्कृष्टता को बरक़रार रखना हर ज़िम्मेदार लेखक का परम कर्त्तव्य है, परन्तु दुर्भाग्य से हर लिखने वाला ज़िम्मेदार लेखक नहीं हो सकता । इसमें ढेर सारे पेंच हैं । शायद यही कारण है कि जागरण के अतिरिक्त किसी और राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के अखबार ने अभी तक रीडर्स को टिप्पणियों के अलावा मुक्त रूप से ब्लाग और टिप्पणियां दोनों बिना काट-छांट के पब्लिकली पब्लिश करने की सुविधा प्रदान करने का जोखिम नहीं लिया है । इस दृष्टिकोण से देखा जाय तो जागरण ने वह साहस कर दिखाया है, जो अभी तक के पोर्टफ़ोलियो में दुर्लभ है । इस साहसिक कदम से साहित्य को तो बहुत ज़्यादा नहीं, लेकिन हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी को सीधे तौर पर जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हो रहा है, उसकी अनदेखी भी नहीं की जा सकती । आपने भी मार्क किया होगा कि कोई नया टूटा फ़ूटा सा लिखने वाला ब्लागर आता है, और देखते-देखते कुछ सप्ताह और महीनों में ही उसकी भाषा-शैली और व्याकरण दोनों ही परिपक्व होकर काफ़ी समृद्ध हो जाते हैं । क्या यह उपलब्धि देश के लिये सकारात्मक और उत्पादक नहीं है ? इसके सापेक्ष भी गौर करना होगा । खुद मेरा अपना अनुभव भी मुझे आज कम संतुष्टि नहीं दे रहा । आज आप जिन कुछ चुनिन्दा लड़कों की रचनाओं की भूरि-भूरि प्रशंसा करते नहीं अघाते, मैंने और सभी ने उनके अंदर होने वाले क्रमिक विकास को काफ़ी क़रीब से देखा है । जब कभी किसी ने ज़मीन छोड़ने की कोशिश की, सभी निष्ठावान ब्लागर्स और खुद मंच ने भी उसकी तीव्र भर्त्सना कर उसे वापस ज़मीन पकड़ने पर बाध्य किया है । लेकिन फ़िलहाल ब्लागर्स की बढ़ती भीड़ और कई प्रकार के नए लेखकों के बड़े पैमाने पर ज्वाइनिंग के कारण आप के द्वारा रेखांकित की गई समस्याएं भी बेशक बढ़ रही हैं । लेकिन यहां भी एक सकारात्मक तथ्य है कि इधर नवोदितों के रूप में मंच ने कई लेखकीय प्रतिभाओं से भी परिचय पाने का सौभाग्य प्राप्त किया है । मैं इस मामले में नीचे श्री राजीव दुबे जी की टिप्पणी के वाक्य \'जो मूल्यवान होगा वह स्वतः ही दीप्त हो दीर्घायु होगा और जो निःसार होगा वह समय के गर्त में खो जाएगा\', से पूर्णतया सहमत हूं । शेष काम आपका यह ओजस्वी आलेख और उसमें निहित अपील भी करेगी ही, हमें ऐसी प्रत्याशा अवश्य रखनी चाहिये । साधुवाद ।

के द्वारा:

हिमांशु जी नमस्कार, सबसे पहले तो आपको हार्दिक बधाई देना चाहूँगा जो आपने इतनी हिम्मत दिखाई जो इस प्रकार की प्रकृति के ब्लोगर्स की और ऊँगली उठाई, अधि चर्चित, अधि मूल्यित मैं शामिल होने के लिए जिस प्रकार के हथकंडे अपनाये जा रहे है, सच मानो तो मेरे विचार से इनका औचित्य ही ख़त्म हो गया है ! रही बात ब्लोग्स लिखने और शीर्षक की तो जैसे शीर्षक आ रहे है लगता है कोई सेंसर बॉडी स्थापित करनी होगी JJ को ! और उसके बाद कमेन्ट के तो कहने ही क्या ? कहने वाला कह गया दो हिचकियों में राज ए दिल लोग पीछे मुद्दतों तक गुफ्तगू करते रहे. इससे ज्यादा कुछ नहीं लिखा जा सकता ! अब बात आती है साहित्य सेवा की तो यहाँ हर कोई अपनी रूचि और मिजाज के हिसाब से लिखता है, और इस ब्लोगिंग से साहित्य की कौन कैसे सेवा कर रहा है ये, बहुत ही सोचनीय प्रश्न है, इसका जवाव तो बहुत ही मुश्किल है ! बशर्ते जिस मंच पर हम लिख रहे है, उस मंच की गरिमा और मर्यादा को बरक़रार रखना सारे ही ब्लोगर्स का दायित्व है, चाहे वे जूनियर हों या सीनिअर ! यधपि जिन बिन्दुओं पर आपने इशारा किया है उन सब हथकंडों के लिए जूनियर नहीं सीनिअर को ही जिम्मेदारी लेनी होगी, क्योंकि जूनियर वही करता है, जो सीनिअर को करते देखता है ! और यहाँ तो उसे कुछ करने की जरुरत ही नहीं बाकायदा कुछ कोचिंग इंस्टिट्यूट चल रहे है एक प्रतिष्ठित ब्लोगर्स बनाने के, और इनकी फीस भी ज्यादा नहीं है, सिर्फ इन्हें नए ब्लोगर्स का God Father बनने का जूनून है ! एक और बात मैं कहना चाहूँगा जो बिंदु आपने उठाये है JJ की भी इस पर कुछ जिम्मेदारी बनती है, और ये देखना काफी रोचक होगा की JJ आपकी इस पहल को किस प्रकार से लेता है ! बाकी ब्लोगर्स को उनकी मर्यादा और जिम्मेदारी समझाने की जिम्मेदारी लेने के लिए आगे आने के लिए मेरी और से आपको सत-सत नमन !

के द्वारा: allrounder allrounder

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के द्वारा: HIMANSHU BHATT HIMANSHU BHATT

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आदरणीय देवेन्द्र जी.... बातें तो सभी किताबी ही होती हैं.... आपको सिर्फ प्रतीत हुई.... महान आश्चर्य! ... आप कह रहे हैं की जब आपने प्यार किया था...... इसका अर्थ यह भी निकलता है की अब आप प्यार नहीं करते हैं..... देवेन्द्र जी यह है बाल की खल निकलना..... आप कहते हैं की जब आप प्यार कर रहे थे तो कोई रसायन का स्राव नहीं हुआ.... आप अपना रासायनिक परिक्षण कर रहे थे या प्यार.... जनाब ये रसायन ही तो आपकी प्यार की क्रियाओं को उद्दीप्त करते हैं... एक बात और कहना चाहूँगा यह मेरी खोज नहीं है.... मैंने तो वैज्ञानिकों द्वारा किये गए शोध पर यह पोस्ट लिखा है.... RAHI बात AAPKE गोल्ड मेडलिस्ट होने की तो भाई साहब आपके कम्मेंट देने से तो आपके पढ़े लिखे होने का भी प्रमाण नहीं मिलता है.... अगर हमारे संसथान ऐसे लोगों को गोल्ड मेडल देते हैं तो देश का भविष्य निश्चित रूप से अंधकार माय है.... जिन लोगों को कुछ लिखने और कहने का सलीका नहीं है और इस तरह के अहंकार और हिन् भावना के शिकार हैं उनसे कुछ उम्मीद करना बेमानी होगा... आप अगर वाकई में शोध कर चुके हैं तो आपने शोधों से अवगत कराएँ.... आपके शोध भी आपकी तरह ही होंगे..... बोगस.

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हिमांशु जी ने सत्य को जानने का जतन किया है. चूँकि विज्ञानं भी पूर्ण सत्य नही है , यह सत्य की खोज है और लगभग सत्य के नजदीक है. हर एक्शन के पीछे कुछ कारण होते हैं. अगर जान गये तो विज्ञान, वर्ना भगवान. .. जो प्रेम हम करते हैं या हमे हो जाता है उस के पीछे प्रकृति का बहुत बड़ा हाथ है. प्रकृति यानि कुदरत जैव प्रक्रिया को निरंतर बनाये रखने के लिए प्रेम जैसी भावनाओं को उत्प्रेरित करता है. वैज्ञानिक नज़रिए से देखें तो इंसान या कोई भी प्राणी एक सेक्सुअल बाई - प्रोडक्ट है. . कुदरत ने जीवन प्रक्रिया को निरंतर बनाये रखने के लिए सेक्स में आनंद रख दिया .. अब प्राणी उस आनंद की अनुभूति के लिए सेक्स करता है न कि जैव उत्पति के लिए .. प्राणी करता कुछ है और नतीजा कुछ और निकलता है. .. हम इंसानों के मामले में भी प्रेम या प्यार कुदरत के द्वारा थोपी गयी प्रक्रिया का नतीजा है... जब तक हम इस से अनजान हैं तब तक ठीक है. जिस दिन पार्ट उघड जायेगा इस पर से तो उस दिन प्रेम स्वत: विदा हो जायेगा .. !!

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हिमांशु जी आपकी प्रेम के प्रति एक वैज्ञानिक प्रस्तुति तथा शोध वास्तव मैं उल्लेखनीय है......आप प्रेम के विषय मैं इतना ज्ञान रखते है तो क्या आप स्वयं भी इसे प्रक्टिकल मैं ला पाते हैं.....कभी प्यार की गहरे मैं तो उतर के देखो मेरे दोस्त.....कोई रसायन नहीं बल्कि स्वयं प्रेम रस बहता नज़र आयेगा...... ज्ञानवर्धक लेख पर मेरी और से आपको बंधाई हो.तथा साथ मैं प्रतियोगिता के लिए मेरी शुभकामनाएं....इसके अतिरिक्त मेरे से पहले किसी सज्जन...श्रीमान देवेन्द्र जी की प्रतिक्रिया पड़ी .....पड़कर मुझे स्मरण हुआ की शायद मैंने भी उनके लोकल पत्रिका मैं कई शोध पत्र पड़े हैं....मैं इनके मानसिक स्तर की दाद देते हुए भविष्य में इनके लिए भी शुभकामनाये भेजता हूँ......

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श्री हिमांशु जी, मेरे अनुसार प्रेम भले ही ढाई अक्षर का हो परन्तु उसकी परिभाषा व व्याख्या ढाई खरब शब्दों में भी कर पाना असंभव है.......प्रेम तो प्रेम है....कहा जाता है के सभी मनुष्य एक ही आत्मा से बने है तथा अंत में उसी आत्मा में समां जाते है.....इसलिए सभी में अपने अक्ष को देखना तथा अपने को ढूँढना ही प्रेम है क्योंकि प्रेम में डूबा व्यक्ति दुसरे में भी खुद को ही खोजता है .......जिस प्रकार भगवान् से प्रेम करने वाला व्यक्ति हर जगह अपने उस भगवान् को देखता है ठीक उसी प्रकार प्रेम करने वाला व्यक्ति हर जगह प्रेम ही खोजता है .....प्रेम ही फेलाता है तथा प्रेम ही करता है....प्रेम में उसके लिए कोई बड़ा या छोटा नहीं.....कोई जाती या बंधन नहीं......कोई समाज..देश या सीमा नहीं....वो तो बस प्रेम करता है ....प्रेम खोजता है.....प्रेम बांटता है......यदि इस प्रकार का व्यक्तित्व हर जगह जो जाये तो इस संसार से अन्याय तथा नफरत दूर हो जाये.....प्रेम को हम कह नहीं सकते .......देख नहीं सकते बस अनुभव कर सकते है.......आओ मिलकर ऐसा प्रेम करे तथा उस भगवान की इस अनोखी दुनिया तथा जीवन को साकार करें........... हिमांशु जी, एक अच्छे लेख पर आपको बधाई तथा साथ में प्रतियोगिता के लिए आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं —

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के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

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आपकी बात बिलकुल सही है...... लेकिन अगर आप इन्हें यथार्थ के धरातल में महसूस करते हैं तो..... आप अगर वर्तमान में वाकई में जीते हैं तो आप निश्चय ही धन्यवाद के पात्र हैं ..... इस सम्बन्ध में मैंने पूर्व में एक कहानी भी लिखी थी आप उसे भी अवश्य पढियेगा..... लेकिन स्पष्ट करें की यदि आप वर्तमान में जीते हैं तो २५ वर्ष बाद १ करोड़ की कीमत को लेकर इतने चिंचित क्यों हैं.... प्रस्तुत लेख में आपको जीवन सुख से न जीने की सलाह नहीं दी गयी थी अपितु सही निवेश के द्वारा धन जो की आपने अर्जित किया है उसका सही और उचित निवेश करने की सलाह दी गयी थी..... इस लेख में धन के अर्जन के लिए भागने की बात कही ही नहीं गयी अपितु केवल आप जो निवेश करते हैं उसे उचित एवं समझदारी से करने की और ध्यान दिलाया गया था..... यह मैंने कहीं कहा ही नहीं की इस धन से आप ख़ुशी खरीद सकेंगें अपितु लेख के आरम्भ में मै यह पहले ही स्पष्ट कर चूका हूँ की धन साधन है साध्य नहीं..... आदरणीय विमल जी आप जिस तरह से धन का पुरजोर विरोध कर रहे हैं उससे तो यही प्रतीत होता है की धन आपके मन मस्तिष्क में बहुत अन्दर तक पकड़ बनाये हुए है.... जो की नकारात्मक रूप से आपको जकड़े हुए है... अगर ऐसा है तो यह स्थिति आपके लिए उचित नहीं है.... धन को जीवन का केंद्र न बन्ने दे.... किसी भी रूप में चाहे वह धन का विरोध ही क्यूँ न हो.... क्यूंकि विरोध भी हमें उसके नजदीक ही लाता है... धन से पकड़ छोड़ दे.... धन को समभाव की दृष्टि से देखें.... चाहे प्रचुर हो या न्यून.... आशा करता हूँ अब आप मेरे लेख का मंतव्य अवश्य समझ गए होंगे अगर फिर भी कोई प्रश्न हों.... इस पोस्ट पर या मेरी अन्य पोस्ट पर तो आप सहृदय आमंत्रित हैं..

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आपका रिप्लाई पढ़ा-- कदाचित आप मेरा आशय नहीं समझे -- इसलिए मुझे दिग्भर्मित मान कर चल रहे हैं --- मेरा मानना है की हमेशा हर पल हमें वर्तमान में जीना चाहिए --- पहले वर्तमान तो ठीक से जी लें --- यह अपने अनुभवों के आधार पर कह रहा हूँ --- बचत उतनी ही करनी चाहिए जो सामान्य जीवन यापन और आनन्दित आज जीने पर बच जाये-- एक साथ कई जगह हाथ पाँव मारना तनाव का कारण ही बनेगा --- जितनी अधिक अपेक्चा उतनी अधिक अशांति-- जितनी कम अपेक्चा उतनी कम अशांति -- वर्तमान जियो जो हो गया हो गया जो होगा तब देखा जायेगा -- दुनिया में पैसा सब कुछ kharid sakta है पर khusi kisi baajar में नहीं milti यह तो hamare man में create hoti है -- paise के piche bhagenge तो bimarinya dubak के khadi hongi एक एक कर pakad lengi --

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नमस्कार विमल जी, आप कहते हैं की २५ या ३० वर्ष बाद १ करोड़ की कीमत क्या होगी..... महोदय यह तो आप को सोचना है की आपको २५ वर्ष बाद क्या चाहिए.... आप उसी अनुपात में निवेश करें.... रही बात इच्छाओं का दमन करने की... ऐसी बात नहीं है.... हमें इच्छाओं का दमन नहीं करना है.... अपितु अनावश्यक दैनिक खर्चों पर लगाम लगानी है.... आप अगर अपने खर्चों का लिखित ब्यौरा तैयार करें तो आप पाएंगे की कई खर्चे आप अनावश्यक ही करते हैं..... मई उन खर्चों की बात कर रहा हूँ.... अनावश्यक इच्छाओं पर आपको विवेक से काम लेना होगा नहीं तो आप भविष्य की आवश्यक इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाएंगे.... महोदय आपसे विनम्र निवेदन है की चीजों को सकारात्मक परिदृश्य में देखें ...... एक और आप कहते हैं की २५ वर्ष बाद १ करोड़ से क्या होगा..... और दूसरी ओर आप कहते हैं की इच्छाओं का दमन कर उस धन का उपयोग मनुष्य क्या कब्र में करेगा..... इससे स्पष्ट है की आप स्वयं में ही दिग्भ्रमित हैं..... आपसे निवेदन है की आप पहले स्वयं के लक्ष्य निर्धारित करें.... फिर मार्ग चुनने में आपको आसानी होगी.... नहीं तो जीवन में भटकाव के सिवा कुछ हासिल नहीं होगा..... यह आपके लिए हर दृष्टि से जरुरी है.... यदि और स्पष्टीकरण की आवश्यकता हो तो अवश्य बताइयेगा....

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आपकी इस कहानी मे कुछ जोड़ना चाहता हूँ......... ओर वो ये है की सिकंदर ने कहा…. उसके बाद क्या ? उसके बाद तो मै शांति से रहूँगा… ओर फिर जब सिकंदर सब कुछ जीत चुका तो वापस अपने घर जाते हुए .......... रास्ते मे जब वो बहुत बीमार हो गया ओर उसके चिकित्सकों ने कहा की उसका बच पाना नामुमकिन है.......... तो उसने चिकित्सक से कहा की वो अपना आधा साम्राज्य उस चिकित्सक को दे देगा.......... बस वो उसको इतनी देर तक बचा ले की मरने से पहले वो अपनी माँ से मिल ले............ पर चिकित्सक ने कहा आधा क्या पूरा राज्य मिलने पर भी वो उसको नहीं बचा सकता है................. तो फिर कहाँ वो शांति से रहा.......... अपितु वो तो शांति से मर भी नहीं पाया............... दो किश्तें दी जा चुकी हैं.......... एक फिर बाद मे..............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

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एक पुराना मगर अत्यन्त उपयोगी सिद्धान्त है आपको जैसा व्यवहार चाहिए वैसा ही व्यवहार आप दूसरों के प्रति करें। आप केवल इस बात में न उलझे रहें कि आप के साथ अच्छा व्यवहार हो और दायित्व भूल जाएं। प्रिय श्री हिमांशु जी ...नमस्कार ... आप का यह लेख तो अब आया है ...लेकिन मैं इससे पहले ही इसकी बातो पर अमल कर चुका हूँ ... जब मैंने और सचिन जी ने एक दूसरे पर एक एक लेख लिख लिया तो सभी तमाशा देखने वाले ब्लोगर साथी यह सोच रहे थे और आशा कर रहे थे की यह सिलसिला लंबा चलेगा ... लेकिन मैंने अपनी समझदारी से हवा के रुख को दूसरी तरफ मौड दिया और एक अलिखित और अघोषित स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की नीव रख दी .... प्रेम पर मैं भी एक वयंग्य लिखने वाला हूँ ..... आप से प्रार्थना है की सिस प्रकार नीतिगत बाते बताते रहे ... धन्यवाद

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